4. सुधारक और उनकी नियति - Page 84

सुधारक और उनकी नियति

69

  1. और उस समय वज्र को धारण करने वाला पे्रत, अग्नि से दहकते हुए, चौंधियाने वाले और प्रकाशमय शक्तिशाली लोह पिंड के साथ अम्बट्ठ के ऊपर आसमान में, इस इरादे से खड़ा हो गया कि अगर उसने उत्तर नहीं दिया, तो उसका सिर वहीं टुकड़ों में खंडित कर दिया जाएगा। और महाभाग ने वज्र धारण किए हुए पे्रत को देखा, और अम्बट्ठ ब्राह्मण को भी वह दिखाई दिया और इस स्थिति से अवगत होने पर आतंकित, स्तंभित और व्यग्र अम्बट्ठ महाभाग से सुरक्षा, संरक्षण और सहायता की याचना करता हुआ भयभीत होकर उनके पार्श्व में सिमट कर बैठ गया और बोला, ‘महाभाग, आपने क्या कहा था? एक बार फिर कहिए।’

‘तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? जब वयोवृद्ध और अनुभवी ब्राह्मण, तुम्हारे गुरुजन अथवा उनके गुरुजन इस संबंध में आपस में बात कर रहे थे कि कान्हायनों की मूल उत्पति कहां से हुई और उनका वह पूर्वज कौन था जिसका कि वे अपने-आपको वंशज बताते हैं, तुमने इस बारे में क्या सुना है?’

‘ठीक ऐसा ही, गौतम, मैंने सुना है जैसा कि श्रद्धेय गौतम ने कहा है। कान्हायनों की मूल उत्पत्ति वही है, और वही उनका पूर्वज है, जिसका कि वे अपने-आपको वंशज बताते हैं।’

  1. और जब वह इस प्रकार बोल चुके, तो युवा ब्राह्मणों में क्षोभ, अशांति और हलचल मच गई और उन्होंने कहाः ‘उनका कहना है कि अम्बट्ठ ब्राह्मण जन्म से नीच है, वे कहते हैं कि उसके परिवार की पृष्ठभूमि अच्छी नहीं है। वे कहते हैं कि वह दासी कुल में उत्पन्न हुआ है और शाक्य उसके स्वामी थे। हम यह नहीं मानते कि श्रमण गौतम जिनके शब्दों में सत्यता है, वह विश्वासयोग्य व्यक्ति नहीं है।’

  2. और महाभाग ने सोचाः ‘ये ब्राह्मण एक दासी की संतान के रूप में अम्बट्ठ का बहुत अपमान कर रहे हैं। मुझे उनके अपमान से इसे मुक्त करना चाहिए। और उन्होंने कहाः

‘अम्बट्ठ ब्राह्मण को उसके वंश के आधार पर इतनी निर्दयता से अपमानित मत कीजिए। वह कान्हा एक शक्तिशाली सिद्ध पुरुष बन गया था। वह दक्षिण में गया। वहां उसने रहस्यवादी पद्य सीखे और राजा ओक्काक के पास वापस आकर उसने विवाह में उसकी बेटी मद्दरूपी का हाथ मांगा। उत्तर में राजा ने उससे कहाः ‘यह व्यक्ति वास्तव में कौन है जो मेरी दासी का पुत्र होने पर भी विवाह के लिए मेरी पुत्री का हाथ मांग रहा है। और क्षुब्ध तथा अप्रसन्न होकर उसने अपने धनुष में बाण चढ़ा दिया। लेकिन न तो वह तीर चला सका, और न वह प्रत्यंचा से पुनः उसे हटा ही सका। तब मंत्री तथा दरबारी सिद्ध पुरुष कान्हा के पास गए और कहाः ‘श्रीमान्, राजा की रक्षा कीजिए, राजा की रक्षा कीजिए।’