72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- ‘किंतु इस बारे में तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? यदि क्षत्रिय उसी प्रकार किसी क्षत्रिय को न्याय के लाभ से वंचित करके भूमि अथवा बस्ती से निष्कासित कर देते हैं, तो क्या ब्राह्मणों के मध्य उसे आसन और जल प्रदान किया जाएगा?’
‘हां, उसे प्रदान किया जाएगा, गौतम।’
‘और क्या उसे पितरों के निमित्त आयोजित भोज, अथवा दूध में उबाले गए खाद्य, अथवा देवताओं को दी जाने वाली भेंट, अथवा उपहार के रूप में भेजे जाने वाले भोजन में सम्मिलित होने की अनुमति दी जाएगी?’
‘हां, गौतम, अनुमति दी जाएगी।’
‘और क्या ब्राह्मण उसे अपने पद्य सिखाएंगे।’
‘वे सिखाएंगे, गौतम।’
‘और उसे उनकी स्त्रियों से अलग रखा जाएगा अथवा नहीं?’
‘उसे अलग नहीं रखा जाएगा, गौतम।’
‘लेकिन, अम्बट्ठ, मुंडित सिर, राख की टोकरी से सने, भूमि तथा आबादी वाले क्षेत्रों से निष्कासित क्षत्रिय का घोर पतन हो जाता है, लेकिन घोर पतन के गर्त में गिर जाने के बावजूद यह धारणा सही है कि क्षत्रिय श्रेष्ठ हैं और ब्राह्मण हेय हैं।’
- ‘तथापि एक ब्रह्म देवता सुनामकुमार ने यह श्लोक कहा है’ः
वंश-परंपरा के प्रति आस्थावान इस जन-समूह में क्षत्रिय सर्वोत्तम है, किंतु जो विवेक और सत्यता में परिपूर्ण है, वह देवों और मनुष्यों में सर्वोत्तम है।
‘अब, अम्बट्ठ यह श्लोक ब्रह्म सुनामकुमार द्वारा सही तौर से गाया और कहा गया था, जो अर्थपूर्ण है, रिक्त नहीं है। मैं भी इसका अनुमोदन करता हूं।’
‘मैं भी’, अम्बट्ठ कहता है।
‘वंश-परंपरा के प्रति आस्थावान इस जन-समूह में क्षत्रिय सर्वोत्तम है। लेकिन जो विवेक और न्यायनिष्ठा में परिपूर्ण है, वह देवों और मनुष्यों में सर्वोत्तम है।’
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(पाठ के लिए प्रथम भाग यहां समाप्त होता है)
- ‘लेकिन, गौतम, उस पद्य में व्यक्त सत्यता क्या है? और विवेक क्या है?’
‘विवेक और सत्यता की सर्वोच्च पूर्णता में, अम्बट्ठ, जन्म अथवा वंश-परंपरा, अथवा इस प्रकार के अभिमान का प्रश्न ही नहीं उठता, जिसके आधार पर यह कहा जाता हैµआपको उतना ही योग्य माना जाता है, जितना मुझे, अथवा आपको उतना योग्य