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सुधारक और उनकी नियति

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नहीं माना जाता, जितना मुझे। जब कभी विवाह की बात चलती है, अथवा विवाह में देने की बात होती है, तो इस प्रकार की बातों का उल्लेख किया जाता है। अम्बट्ठ, जो भी जन्म अथवा वंश-परंपरा, अथवा सामाजिक स्थिति के अभिमान, अथवा विवाह द्वारा संबंध की दासता से ग्रस्त हैं, वे सर्वोत्तम विवेक और सत्यता से दूर हैं। इस प्रकार की दासता से मुक्त होने पर ही मनुष्य विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता अपने लिए प्राप्त कर सकता है।’

  1. ‘लेकिन, गौतम, वह आचरण और वह विवेक क्या है?’

(यहां शील के अधीन इसका उल्लेख है)

बुद्ध के आविर्भाव, उनके उपदेश, श्रोता के मतांतरण और उनके द्वारा संसार के परित्याग के संबंध में परिचयात्मक अनुच्छेद (श्रमणफल के पाठ्य का 40.42, पृष्ठ 62, 63) उसके पश्चात आते हैंः

  1. उपरोक्त शील, पृष्ठ, 4-12 (8.27) में केवल आंशिक भिन्नता है। प्रत्येक

खंड के अंत में दुहराए गए परिच्छेद में यह आता हैः ‘यह उसमें नैतिकता के रूप में जानी जाती है।’

उसके पश्चात करुणा के अधीन

  1. विश्वास के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 63 के पृष्ठ 69। इसके बाद अंश इस प्रकार हैः ‘यह उसमें आचरण के रूप में माना जाता है।’

  2. इंद्रियों का द्वार सुरक्षित है, के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 64 के पृष्ठ 70।

  3. सावधान और आत्मलीन के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 65 के पृष्ठ 70।

  4. संतोष के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 66 के पृष्ठ 71।

  5. एकाकीपन के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 67 के पृष्ठ 71।

  6. ‘पांच बाधाएं’ के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 68-74 के पृष्ठ 71-72।

  7. चार गहन ध्यान के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 73-76 के पृष्ठ 75-82। प्रत्येक के अंत में अंश ‘पिछले से उच्चतम और अच्छे को’ यहां वास्तव में सन्यासी के जीवन के उच्चतर फल के रूप में न पढ़कर उच्चतर आचरण के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

विवेक (विग्ग) के अधीन

  1. ज्ञान से उत्पन्न होने वाली अंतर्दृष्टि (नानादासनम्) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 83-84 के पृष्ठ 76। इसके बाद अंश हैः ‘यह उसमें विवेक के रूप में जाना जाता है और वह अंतिम से उच्चतर और अधिक मधुर है।’

  2. बौद्धिक छवि के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 85-86 के पृष्ठ 77।