74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रहस्यमय देन (इद्धी) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 87-88 के पृष्ठ 77।
दिव्य कर्ण (दिब्बासोता) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 89-90 के पृष्ठ 79।
दूसरों के हृदय का ज्ञान (कटो-परियानानम) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 91-92 के पृष्ठ 79।
पिछले जन्म का स्मरण (पुब्बे निवास-अनुस्साती-नामा) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 93-94 के पृष्ठ 81।
दिव्य चक्षु (दिब्बा चक्खु) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 95-96 के पृष्ठ 82।
भयंकर बाढ़ का नाश (आसावानम खयनानम) के संबंध में अनुच्छेद, पाठ्य 97-98 के पृष्ठ 83।
‘अम्बट्ठ, इस प्रकार के मनुष्य को विवेक में, आचरण में और विवेक तथा आचरण, दोनों में परिपूर्ण कहा जाता है। और विवेक तथा आचरण में कोई अन्य पूर्णता इससे अधिक उच्चतर और मधुर नहीं है।
- ‘अब, अम्बट्ठ, विवेक और सौजन्य की इस सर्वोच्च पूर्णता में चार क्षरण हैं और ये चार क्या हैं? अम्बट्ठ, यदि कोई संन्यासी अथवा ब्राह्मण विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता, पूर्ण रूप से प्राप्त किए बिना, अपने कंधे पर बहंगी (ईंधन, पानी का घड़ा, सुइयां और भिक्षुक साधु का शेष साज-सामान ले जाने के लिए) उठाए हुए गहन वन में प्रवेश करता है, और स्वयं यह शपथ लेता हैः एतद् पश्चात मैं उनमें से एक बन जाऊँगा, जो केवल स्वयं गिरे हुए फलों पर निर्वाह करते हैं तो निश्चित ही वह उसका केवल सेवक बनने की योग्यता रखता है, जिसने विवेक और सत्यता को प्राप्त कर लिया हो।
और पुनः, अम्बट्ठ, यदि कोई संन्यासी अथवा ब्राह्मण विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता, पूर्ण रूप से प्राप्त किए बिना, और केवल स्वयं गिरे हुए फलों पर निर्वाह न कर पाने की स्थिति में, अपने साथ कुदाली और टोकरी लेकर गहन वन में प्रवेश करता है, और स्वयं यह शपथ लेता हैः ‘एतद् पश्चात् मैं उनमें से एक बन जाऊंगा, जो केवल कंद और फलों के मूलों पर निर्वाह करते हैं’, तो निश्चित ही, वह उसका केवल सेवक बनने की योग्यता रखता है, जिसने विवेक और सत्य को प्राप्त कर लिया हो।
‘और पुनः, अम्बट्ठ, यदि कोई संन्यासी अथवा ब्राह्मण विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता, पूर्ण रूप से प्राप्त किए बिना, और केवल स्वयं गिरे हुए फलों और कंद-मूल तथा फलों पर निर्वाह न कर पाने की स्थिति में, किसी गांव अथवा नगर की सीमाओं के समीप स्वयं अग्नि-मंदिर का निर्माण करता है और अग्नि-देव की उपासना करते हुए वहां निवास करता है, तो निश्चित ही वह उसका केवल सेवक बनने की