सुधारक और उनकी नियति
योग्यता रखता है, जिसने विवेक और सत्यता को प्राप्त कर लिया हो।
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‘और पुनः अम्बट्ठ, यदि कोई सन्यासी अथवा ब्राह्मण विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता पूर्ण रूप से प्राप्त किए बिना, और केवल स्वयं गिरे हुए फलों और कंद-मूल तथा फलों पर निर्वाह न कर पाने, और अग्नि-देव की उपासना न कर पाने की स्थिति में, किसी चौराहे पर, जहां चार उच्च मार्ग मिलते हैं, स्वयं चार द्वारों वाले एक भिक्षागृह का निर्माण करता है, और वहां रहते हुए स्वयं को यह कहता है, ‘चाहे संन्यासी हो अथवा ब्राह्मण, जो कोई भी इन चार दिशाओं में से किसी भी दिशा से यहां से गुजरेगा, मैं अपनी योग्यता और सामर्थ्य के अनुसार उसका स्वागत करूंगा’, तो निश्चित ही वह उसका केवल सेवक बनने की योग्यता रखता है, जिसने विवेक और सत्यता को प्राप्त कर लिया हो।’
‘अम्बट्ठ, सत्यता और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता में ये चार क्षरण हैं।’
- ‘अब, अम्बट्ठ, तुम क्या सोचते हो? क्या एक ही गुरू के अधीन शिष्यों की एक कक्षा के रूप में तुम्हें विवेक और आचरण की सर्वोच्च पूर्णता के संबंध में अनुदेश प्राप्त हो चुके हैं।’
‘ऐसा नहीं है, गौतम। मेरा ज्ञान इतना कम है कि मैं उसका दावा भी नहीं कर सकता। विवेक और आचरण की पूर्णता कितनी महान है। मैं किसी भी प्रकार के प्रशिक्षण से दूर रहा हूं।’
‘तब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? यद्यपि तुमने विवेक और सौजन्य की यह सर्वोच्च पूर्णता पूर्णरूपेण प्राप्त नहीं की है, तो क्या तुमने अपने कंधों पर बोझ उठाने और एक ऐसे मनुष्य की तरह गहन वन में प्रवेश करने का प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जो स्वेच्छा से यह शपथ ले सके कि वह केवल स्वयं गिरे हुए फलों पर निर्वाह करेगा?’
‘वह भी नहीं, गौतम।’
‘तब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? यद्यपि तुमने विवेक और सौजन्य की यह सर्वोच्च पूर्णता पूर्णरूपेण प्राप्त नहीं की है, और तुम स्वयं गिरे हुए फलों और कंद-मूल तथा फलों पर भी निर्वाह नहीं कर सकते, तो क्या तुम्हें किसी गांव अथवा नगर की सीमाओं पर स्वयं एक अग्नि-मंदिर का निर्माण करना, और एक ऐसे मनुष्य की तरह वहां रहना सिखाया गया है, जो स्वेच्छा से अग्नि-देव की सेवा करेगा।’
‘वह भी नहीं, गौतम।’
‘तब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? यद्यपि तुमने विवेक और सौजन्य की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त नहीं की है, और तुम स्वयं गिरे हुए फलों और कंद-मूल तथा फलों पर निर्वाह नहीं कर सकते, और तुम अग्नि-देव की सेवा भी नहीं कर सकते, तो क्या तुम्हें स्वयं एक ऐसे स्थान पर चार द्वारों वाले भिक्षागृह का निर्माण करना सिखाया गया है,