76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जहां चार उच्चतम मार्ग एक-दूसरे से मिलते हों, और जहां तुम एक ऐसे मनुष्य की तरह निवास कर सको, जो स्वेच्छा से यह शपथ लेगा कि चार दिशाओं में से किसी भी दिशा से जो कोई भी वहां से गुजरेगा, तो तुम अपनी योग्यता और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसका स्वागत करोगे।’
‘वह भी नहीं, गौतम।’
‘इसलिए, अम्बट्ठ, शिष्य के रूप में सर्वोच्च विवेक और आचरण के मामले में ही नहीं, अपितु उन चार क्षरणों में से किसी एक के संबंध में भी, जिसके कारण विवेक और आचरण की पूर्ण प्राप्ति बाधित हो जाती है, तुम्हारे उचित प्रशिक्षण में कमी रह गई है, और तुम्हारे गुरु, ब्राह्मण पोष्करसाति ने भी तुम्हें यह कहावत बताई हैः ‘ये मुंडित सिर वाले छद्मवेशी साधु, काले भृत्य, हमारे बांधवों के चरणों की धूल कौन हैं, जो तीनों वेदों के ज्ञान में पारंगत ब्राह्मणों से वार्ता करने का दावा करते हैं।’ जब कि वह स्वयं अपेक्षाकृत न्यून कर्तव्यों में से किसी एक का भी पालन नहीं कर सके हैं (जिनके कारण मनुष्य ऊंचे कर्तव्यों की अपेक्षा करते हैं)। देखो, अम्बट्ठ, तुम्हारे गुरु, ब्राह्मण पोष्करसाति ने तुम्हारे साथ कितना बड़ा अन्याय किया है।
‘और, अम्बट्ठ, ब्राह्मण पोष्करसाति कौशल-नरेश प्रसेनजित के अनुदान का उपभोग करता है। लेकिन नरेश उसे अपनी उपस्थिति में आने की अनुमति नहीं देता है। जब वह उससे परामर्श करता है, तो वह उससे केवल आवरण के पीछे से बोलता है। यह कैसी बात है, अम्बट्ठ, कि प्रसेनजित, जिससे वह इस प्रकार का शुद्ध और विधि-सम्मत निर्वाह-व्यय स्वीकार करता है, वह उसे अपनी उपस्थिति में आने की अनुमति नहीं देता। देखो, अम्बट्ठ, तुम्हारे गुरु, ब्राह्मण पोष्करसाति ने तुम्हारे साथ कितना बड़ा अन्याय किया है?
‘अब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? मान लो, राजा अपने हाथी की गर्दन पर या अपने घोड़े की पीठ पर बैठा है, अथवा अपने रथ के पायदान पर खड़ा है और वह अपने प्रमुखों अथवा राजकुमारों से राज्य के बारे में चर्चा करता है, और मान लो, जैसे ही वह अपने स्थान को छोड़कर एक तरफ चला जाता है, एक श्रमिक (शूद्र) अथवा श्रमिक का दास वहां आता है और वहां खड़े होकर उस विषय पर चर्चा करते हुए कहता है, ‘राजा प्रसेनजित ने ऐसा-ऐसा कहा।’ यद्यपि उसने राजा की तरह ही कहा हो और राजा की तरह ही चर्चा की हो, तथापि क्या उससे वह राजा बन जाएगा, अथवा उसका कोई अधिकारी ही बन जाएगा?’
‘कदापि नहीं, गौतम।’
- ‘लेकिन ठीक इसी तरह, अम्बट्ठ, ब्राह्मणों के उन पुराने कवियों (ऋषियों), रचनाकारों, पद्य-गायकों के प्राचीन रूप में विद्यमान शब्दों को उन्हीं की धुन में अथवा