4. सुधारक और उनकी नियति - Page 92

सुधारक और उनकी नियति

77

संगीतबद्ध रूप में आज के ब्राह्मण पुनः गाते हैं, उनका पूर्वाभ्यास करते हैं और उन्हीं की तरह उनका पाठ करते हैं, जैसे अत्थका, वामका, वामदेव, यमदग्नि, अंगीरस, भारद्वाज, वशिष्ठ, विश्वामित्र, कश्यप और भृगु। तुम कह सकते हो, ‘एक शिष्य के रूप में मुझे उनके पद्य कंठस्थ हैं,’ क्या उस आधार पर तुम ऋषि की पदस्थिति प्राप्त कर सकते हो? इस प्रकार की स्थिति का कोई अस्तित्व नहीं है।

  1. ‘अब तुम क्या सोचते हो, अम्बट्ठ? तुमने इस बारे में क्या सुना है, जब बूढ़े और अनुभवी तथा वयोवृद्ध ब्राह्मण, तुम्हारे गुरु और उनके गुरु वार्तालाप कर रहे थे, क्या वे पुराने ऋषि जिनके पद्यों को तुम गाते और दुहराते रहते हो, सुसज्जित होकर इत्र का प्रयोग करके, अपने बालों और अपनी दाढ़ी संवार कर, पुष्पहारों तथा रत्नों-सहित, सफेद वस्त्र पहने हुए, पांचों ऐन्द्रिय सुखों का पूर्ण आनंद लेते हुए, आत्म-प्रदर्शन करते फिरते थे, जैसा कि अब तुम और तुम्हारे गुरु भी करते फिरते हैं।’

फ्वैसा नहीं, गौतम।’

‘और क्या वे उत्तम पके हुए चावलों पर अपना निर्वाह करते थे, जिससे खराब दाने निकाल दिए गए हों, और जिसे विभिन्न प्रकार के मसालों और कढ़ी से जायकेदार बनाया गया हो, जैसा कि तुम और तुम्हारे गुरु अब करते हैं?’

‘वैसा नहीं, गौतम।’

‘अथवा क्या झालरयुक्त और चुन्नटदार घाघरा पहने हुए स्त्रियां उनकी सेवा में तत्पर रहती थीं, जैसे कि अब तुम्हारी और तुम्हारे गुरु की सेवा में रहती हैं?

‘अथवा क्या वे वेणीयुक्त और चुन्नटदार पूंछों वाली घोडि़यों द्वारा खींचे गए रथों को लंबे सोटे से हांकते फिरते थे, जैसा कि अब तुम और तुम्हारे गुरु करते हैं?’

‘वैसा नहीं, गौतम।’

‘अथवा क्या उन्होंने लंबी तलवारों से सज्जित पुरुषों द्वारा, स्वयं को ऐसी किलेबंदी वाले नगरों में अभिरक्षित कराया है, जिनके चारों ओर खाइयां खुदी हुई हैं और जिनके द्वारों के सामने कैंची द्वार लगाए गए थे, जैसाकि तुम और तुम्हारे गुरु करते हैं।’

‘वैसा नहीं है, गौतम।’

  1. ‘तब, अम्बट्ठ, न तो तुम और न तुम्हारे गुरु ऋषि हैं और न तुम ऐसी स्थितियों में रहते हो, जिनमें ऋषि रहते थे। किंतु, अम्बट्ठ, चाहे कोई भी कारण हो, जिसकी वजह से तुम मेरे बारे में आशंका और भ्रांति में पड़े हो, तुम मुझसे पूछ सकते हो। मैं स्पष्टीकरण द्वारा उसे स्पष्ट कर दूंगा।’

  2. तब महाभाग अपने कक्ष से निकले और उन्होंने इधर से उधर विचरना आरंभ