78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कर दिया। अम्बट्ठ ने भी वही किया और इस प्रकार महाभाग का अनुसरण करते हुए उसने महापुरुष में पाए जाने वाले बत्तीस लक्षण महाभाग के शरीर में हैं या नहीं, परखना चाहा। और उसे दो लक्षणों को छोड़कर सभी लक्षण दिखाई दिए। दो लक्षणों, प्रछन्न अंग और जिह्वा का विस्तार, के बारे में उसे शंका तथा भ्रम हुआ, और वह संतुष्ट और निश्चित नहीं हो पाया।
- और महाभाग को ज्ञात था कि उसे इस प्रकार की शंका है। और उन्होंने अपनी अद्भुत देन द्वारा इस प्रकार की व्यवस्था की कि ब्राह्मण अम्बट्ठ ने देखा कि महाभाग का वह अंग जिसे वस्त्रों से आच्छादित होना चाहिए था, किस प्रकार एक खोल में समावृत्त था। और महाभाग ने अपनी जिह्वा को इस प्रकार घुमाव दिया कि उससे उन्होंने दोनों कानों को स्पर्श किया और सहलाया, और अपने दोनों नासिका रंध्रों को स्पर्श किया और सहलाया, और उन्होंने अपने मस्तक के समग्र भाग को अपनी जिह्वा से आवेष्ठित कर लिया।
युवा ब्राह्मण अम्बट्ठ ने सोचाµश्रमण गौतम महापुरुष के केवल कुछ लक्षणों से ही नहीं, अपितु पूरे बत्तीस लक्षणों से संपन्न हैं। और उसने महाभाग से कहाः ‘अब, गौतम, हमारा जाना हितकर रहेगा। हम व्यस्त हैं और हमें बहुत से कार्य करने हैं।’
‘अम्बट्ठ, जो तुम्हें उपयुक्त लगे, वही करो।’
और अम्बट्ठ घोडि़यों द्वारा खींचे जाने वाले अपने रथ पर चढ़ा और वहां से विदा हो गया।
उस समय ब्राह्मण पोष्करसाति ब्राह्मणों के बड़े समूह के साथ उक्कट्ठा से चला गया था, और अपने ही विहारोद्यान में बैठा हुआ वहां अम्बट्ठ की प्रतीक्षा कर रहा था। और अम्बट्ठ विहार में आया। और जब वह अपने रथ में वहां तक आया जहां तक रथों के लिए मार्ग सुगम था, वह रथ से उतर गया और पैदल ही वहां पहुंचा जहां पोष्करसाति थे, और उनका अभिवादन करके उसने सम्मानपूर्वक ढंग से एक ओर अपना आसन ग्रहण किया और उसके इस तरह आसीन हो जाने पर पोष्करसाति ने उससे कहा।
‘अच्छा, अम्बट्ठ, क्या तुमने महाभाग को देखा?’
‘हां, श्रीमन्, हमने उन्हें देखा।’
‘अच्छा, क्या श्रद्धेय गौतम वैसे ही हैं, जैसे उनकी ख्याति है, और जैसा कि मैंने तुम्हें बताया था, उससे अन्यथा तो नहीं हैं। वह ऐसे ही हैं अथवा नहीं?’
‘वह वैसे ही हैं, श्रीमन्, जैसी कि उनकी ख्याति घोषित करती है, उससे अन्यथा नहीं हैं। वह वैसे ही हैं, उससे भिन्न नहीं हैं। और वह महापुरुष के कुछ लक्षणों से ही नहीं, अपितु पूरे बत्तीस लक्षणों से संपन्न हैं।’
‘और क्या, अम्बट्ठ, श्रमण गौतम से तुम्हारी कोई बात हुई?’