4. सुधारक और उनकी नियति - Page 95

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

महापुरुष के बत्तीस लक्षणों को परखा। उसे दो लक्षणों को छोड़कर सभी लक्षण स्पष्ट दिखाई दिए। खोल में, प्रच्छन्न अंग और सुदीर्घ जिह्वा, इन दो लक्षणों के बारे में वह अब तक शंका और अनिर्णय की स्थिति में था। लेकिन महाभाग ने पोष्करसाति को वे लक्षण दिखा दिए, जैसे कि अम्बट्ठ को भी दिखाए थे, और पोष्करसाति ने देखा कि महाभाग महापुरुष के कुछ ही लक्षणों से ही नहीं, अपितु पूरे बत्तीस लक्षणों से संपन्न हैं, और उसने महाभाग से कहाः ‘क्या श्रद्धेय गौतम, संघ के सदस्यों सहित कल का भोजन मेरे साथ करने की कृपा करेंगे?’ और महाभाग ने मौन रहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

  1. तब ब्राह्मण पोष्करसाति ने यह देखते हुए कि महाभाग ने (कल के लिए) प्रार्थना स्वीकार कर ली है, समय की घोषणा कीः ‘समय हो गया है, गौतम, भोजन तैयार है।’ और तब महाभाग ने जो प्रातः ही तैयार हो चुके थे, अपना चीवर पहना और अपना पात्र लेकर बांधवों के साथ पोष्करसाति के घर पर पहुंचे और अपने लिए तैयार किए गए आसन पर बैठ गए। और तब ब्राह्मण पोष्करसाति ने अपने हाथों से पुष्ट और नरम, दोनों ही प्रकार का स्वादिष्ट भोजन महाभाग को और उनके संघ के युवा ब्राह्मण सदस्यों को तब तक परोसा, जब तक कि वे तृप्त नहीं हो गए और उन्होंने और भोजन ग्रहण करने से इंकार नहीं कर दिया, और जब महाभाग भोजन कर चुके, तो उन्होंने अपना पात्र धोया और हस्त प्रक्षालन किया। पोष्करसाति ने नीचे आसन ग्रहण किया और उनके पार्श्व में बैठ गया।

  2. और तब इस प्रकार बैठे हुए उससे महाभाग ने उपयुक्त क्रमानुसार बात की, अर्थात उन्होंने उसे उदारता, सद्आचरण, स्वर्ग और भय के बारे में, मिथ्याभिमान और लोभ की विकृति और त्याग के लाभों के विषय में बताया। और जब महाभाग ने देखा कि ब्राह्मण पोष्करसाति प्रकटतः नरम, पूर्वाग्रह से मुक्त, उन्नत और हृदय से आस्थावान बन चुका है, तब उन्होंने उस सिद्धांत की घोषणा की, जिस पर केवल बुद्ध ही विजय पा सके हैं, अर्थात दुःख का सिद्धांत, उसका मूल, उसकी समाप्ति और इस लक्ष्य को प्राप्त करने का मार्ग। और जिस प्रकार एक स्वच्छ वस्त्र, जिसके सभी दाग धो दिए गए हैं, तुरंत रंग ग्रहण कर लेता है, ठीक उसी प्रकार ब्राह्मण पोष्करसाति को वहां बैठे सत्य को निरखने के लिए शुद्ध और स्वच्छ दृष्टि प्राप्त हो गई, और उसे ज्ञात हुआ, ‘जिस किसी का भी प्रारंभ होता है, उसके साथ ही उसकी समाप्ति की आवश्यकता भी निहित है।’

  3. और तब ब्राह्मण पोष्करसाति ने, जिसने अब सत्य का दर्शन कर लिया था, उस पर विजय प्राप्त कर ली थी, उसे समझ लिया था, उसका गहन चिंतन कर लिया था, जो शंका से परे हो गया था, भ्रांति से मुक्ति पा ली थी और पूर्ण विश्वास प्राप्त कर लिया था, और जो स्वामी के उपदेश के अपने ज्ञान के लिए किसी अन्य पर आश्रित