82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसी प्रकार बांधवों में से पुक्कुसा जाति का निम्न आदिवासी सुनीता था, जिसके पद्यों को थेरी गाथा में सम्मिलित करने के लिए चुना गया है। घोर नास्तिकता का प्रवर्तक सती, मछुआरे के पुत्रों में से था। इस जाति को भी बाद में निम्न जाति माना गया और तब भी निर्दयता के कारण उस व्यवसाय को खास तौर से घृणित माना जाता था। नंदा एक चरवाहा था। दो पंथकों का जन्म एक अच्छे परिवार की कन्या का एक दास के साथ सहवास से हुआ (जिसके कारण मनु के सूत्र 31 में निर्धारित नियमानुसार, वे वास्तव में जाति-बहिष्कृत थे)। कापा एक मृग-आखेटक की पुत्री थी। पुन्ना और पुन्निका दास कन्याएं थीं। सुमंगलमाता श्रमिकों की पुत्री और पत्नी थी, और शुभा लुहार की बेटी थी। और भी उदाहरण निश्चित रूप से दिए जा सकते हैं और ग्रंथों के प्रकाशन के बाद अन्य के बारे में भी पता चलेगा।
इस बात से कोई ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि प्रकट नहीं होती कि संख्या की अल्पता का उपहास किया जाए और यह कहा जाए कि कल्पित बौद्धिकता अथवा उदारता मात्र एक बहाना है। तथ्यों से स्थिति स्वयं स्पष्ट हो जाती है, और संघ के नीच जाति के सदस्यों का प्रतिशत संभवतः शेष आबादी की तुलना में तिरस्कृत जातियों और सिप्पा लोगों के प्रतिशत के अच्छे अनुपात में था। इसी प्रकार थेरी गाथा में वर्णित साठ थेरियों की सामाजिक स्थिति का हमें पता है, जिनमें से पांच का उल्लेख ऊपर किया है, अर्थात संपूर्ण संख्या के साढ़े आठ प्रतिशत नीच जाति में जन्मे थे। इसकी काफी संभावना है कि यह सूचना उस अनुपात के बारे में है, जो एक जैसी सामाजिक स्थिति वाले व्यक्तियों की शेष जनसंख्या से था।
जिस प्रकार बुद्ध ने शूद्रों और नीच जाति के मनुष्यों को भिक्षुओं को सर्वोच्च दर्जा दिलाकर उनकी स्थिति को उन्नत किया, उसी प्रकार उन्होंने स्त्रियों की स्थिति को भी ऊंचा उठाया। आर्यों के समाज में स्त्रियों और शूद्रों को समान स्थिति प्रदान की गई थी, और आर्यों के साहित्य में स्त्रियों और शूद्रों के बारे में साथ-साथ वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनका समान स्तर है। दोनों को सन्यास लेने का कोई अधिकार नहीं था, जब कि संन्यास ही निर्वाण लिए एकमात्र मार्ग था। स्त्रियां और शूद्र निर्वाण से परे थे। बुद्ध ने स्त्रियों के विषय में इस नियम को वैसे ही भंग किया, जिस प्रकार उन्होंने शूद्रों के मामले में किया था। जिस प्रकार एक शूद्र भिक्षु बन सकता था, उसी प्रकार एक स्त्री संन्यासिनी बन सकती थी। यह आर्यों के समाज की दृष्टि में उसे सर्वोच्च दर्जा प्रदान करना था।
बुद्ध ने आर्यों के समाज के नेताओं के विरुद्ध जिस अन्य प्रश्न पर लड़ाई लड़ी, वह अध्यापक और अध्यापन के शीलाचार का प्रश्न था। आर्यों के समाज के नेताओं की यह धारणा थी कि ज्ञान और शिक्षा का विशेषाधिकार ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को प्राप्त है। शूद्रों को शिक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं है। उनका आग्रह था कि अगर उन्होंने स्त्रियों अथवा ऐसे पुरुषों को पढ़ाया जो द्विज नहीं हैं, तो इससे सामाजिक व्यवस्था के