सुधारक और उनकी नियति
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लिए भय उत्पन्न हो जाएगा। बुद्ध ने आर्यों के इस सिद्धांत की निंदा की। जैसा कि राइस डेविड्स ने इस प्रश्न पर कहा हैः ‘हर व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति दी जानी चाहिए, हर ऐसे व्यक्ति को, जो कुछ योग्यताओं से संपन्न है, अध्यापन की अनुमति दी जानी चाहिए, और यदि वह पढ़ाता है तो उसे सबको सब-कुछ पढ़ाना चाहिए, कुछ भी शेष नहीं रखना चाहिए, और किसी को उससे वंचित नहीं रखा जाना चाहिए।’ इस संबंध में बुद्ध और ब्राह्मण लोहिक्क के बीच संवाद का उल्लेख किया जा सकता है, जिसे लोहिक्क सुत्त के रूप में जाना जाता है।
लोहिक्क सुत्त
(अध्यापन के शीलाचार की कुछ बातें)
इस प्रकार मैंने सुना है। एक बार भारी संख्या में संघ के सदस्यों के साथ लगभग पांच सौ भिक्षुकों सहित कौशल जनपदों की यात्रा के दौरान परम श्रेष्ठ साल-वाटिका (साल वृक्षों की पंक्ति से घिरे गांव) में पहुंचे। उस समय, ब्राह्मण लोहिक्क साल-वाटिका में सुस्थापित थे। वह जीवन की हलचल से गुंजित स्थल था, जहां पर्याप्त हरित भूमि थी, वन्य भूमि थी और अनाज था। कौशल-नरेश प्रसेनजित ने उपहार स्वरूप ये क्षेत्र उन्हें इस अधिकार के साथ प्रदान किया था, मानो वह स्वयं राजा हों।
अब, उस समय विचारमग्न ब्राह्मण लोहिक्क निम्नलिखित कुत्सित बात सोच रहा थाः ‘मान लो, कोई श्रमण अथवा ब्राह्मण किसी उच्च स्थिति (मस्तिष्क की) को प्राप्त कर लेता है, तो उसे उसके बारे में किसी को नहीं बताना चाहिए। क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है? दूसरों को बताना तो ऐसा ही होगा, मानो कि कोई मनुष्य एक पुराने बंधन को तोड़कर स्वयं को नए बंधन में फंसा ले। उसी प्रकार मैं कहता हूं कि यह (दूसरों को बताने की इच्छा) एक तरह की लालसा है। क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है?’
अब, ब्राह्मण लोहिक्क ने समाचार सुनाः ‘लोग कहते हैं कि शाक्य कुल के श्रमण गौतम जो धार्मिक जीवन अंगीकार करने के लिए शाक्यों से अलग हो गए थे, अब अपने संघ के बहुत से बांधवों सहित कौशल के जिलों की यात्रा करते हुए साल-वाटिका में पहुंच गए हैं। अब जहां तक श्रद्धेय गौतम का संबंध है, उनकी इतनी ख्याति है कि विदेश में भी उनकी ऐसी चर्चा हैः महाभाग एक अर्हत, पूर्ण प्रबुद्ध, विवेक और सौजन्य से परिपूर्ण, लौकिक ज्ञान से पुष्ट, मार्गदर्शन के इच्छुक नश्वरों के लिए अनुपम पथप्रदर्शक, देवों और मनुष्यों के लिए उपदेशक, वरदान प्राप्त हैं। और वह स्वयं देवताओं, ब्राह्मणों और असम प्रदेश की पहाडि़यों पर मर भाषा बोलने वाले लोगों के ऊपर वाले लोक और उसके नीचे संन्यासियों तथा ब्राह्मणों, राजाओं और प्रजाजन वाले लोक सहित संपूर्ण सृष्टि को पूर्ण रूप से इस तरह जानते और देखते हैं, मानो वह उनके सामने हों, और उस संपूर्ण सृष्टि को जानने के बाद, वह अपने ज्ञान की जानकारी दूसरों को कराते हैं। सत्य जो अपने मूल में सुंदर है, प्रगति में सुंदर है, संपूर्णता में सुंदर है, उसी की उद्घोषणा