4. सुधारक और उनकी नियति - Page 99

84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वह भावना और शब्द में करते हैं, वह उच्चतर जीवन की पूर्णता और पवित्रता का भरपूर ज्ञान कराते हैं। और उस प्रकार के अर्हत के दर्शनार्थ जाना अच्छा है।’

  1. तब लोहिक्क ब्राह्मण ने भेषिक नाई से कहाः ‘आओ भेषिक, वहां जाओ जहां श्रमण गौतम टिके हुए हैं, और वहां जाकर मेरे नाम से उनसे पूछना कि क्या वह रोग और अस्वस्थता से मुक्त हैं, और स्वास्थ्य और शक्ति से पूर्ण सुविधाजनक स्थिति में हैं, और इस प्रकार कहनाः क्या श्रद्धेय गौतम अपने संघ के बांधवों सहित कल का भोजन लोहिक्क ब्राह्मण से ग्रहण करना स्वीकार करेंगे?’

  2. भेषिक नाई ने लोहिक्क ब्राह्मण के शब्दों का पालन करते हुए कहा, ‘बहुत अच्छा, श्रीमन्, और जैसा कहा गया था, उसने वैसा ही किया। और परम श्रेष्ठ ने मौन रहकर उसकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया।

  3. और जब भेषिक नाई ने देखा कि परम श्रेष्ठ ने सहमति दे दी है, वह अपने स्थान से उठा, और अपना दायां हाथ परम श्रेष्ठ की ओर करते हुए वहां से चला गया और लोहिक्क ब्राह्मण के पास पहुंच कर उससे इस प्रकार बोलाः ‘श्रीमन्, आपके आदेशानुसार हमने परम श्रेष्ठ को संबोधित किया और परम श्रेष्ठ ने आने की सहमति दे दी है।’

  4. तब रात्रि के बीत जाने पर लोहिक्क ब्राह्मण ने अपने निवास-स्थान पर पुष्ट और नरम, दोनों ही प्रकार का स्वादिष्ट भोजन तैयार करवाया और भेषिक नाई से कहाः ‘भेषिक, वहां जाओ जहां श्रमण गौतम टिके हुए हैं, और वहां पहुंचकर यह कहते हुए समय की घोषणा कर दोः हे गौतम, समय हो गया है, और भोजन तैयार है।’

भेषिक नाई ने लोहिक्क ब्राह्मण के शब्दों का पालन करते हुए कहा, ‘बहुत अच्छा, श्रीमन्, और आदेशानुसार वैसा ही किया। और परम श्रेष्ठ, जो प्रातः ही तैयार हो गए थे, अपना पात्र लेकर संघ के बांधवों सहित साल-वाटिका की ओर चल पड़े।

  1. अब, ज्यों ही वह चले, भेषिक नाई परम श्रेष्ठ के पीछे-पीछे चलता रहा। और उसने परम श्रेष्ठ से कहाः

‘लोहिक्क ब्राह्मण के दिमाग में निम्नलिखित कुत्सित विचार घर कर गया है, ‘मान लो कि कोई श्रमण अथवा ब्राह्मण किसी उच्च स्थिति (मस्तिष्क की) को प्राप्त कर लेता है, तो उसके बारे में किसी को नहीं बताना चाहिए। क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है? दूसरों को बताना तो ऐसा ही होगा, मानो कि कोई मनुष्य एक पुराने बंधन को तोड़कर स्वयं को नए बंधन में फंसा ले। उसी प्रकार मैं कहता हूं कि यह (दूसरों को बताने की इच्छा) एक तरह की लालसा है।’ यह अच्छा होता, श्रीमन्, यदि परम श्रेष्ठ उसके मस्तिष्क को उस कुत्सित विचार से मुक्त कर देते। क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है?’

‘वही ठीक रहेगा, भेषिक, वही ठीक होगा।’