ग्यारहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने देवताओं का उत्थान-पतन क्यों किया? - Page 102

ग्यारहवीं पहेली

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देवी ने विष्णु से भी अपने साथ विवाह करने को कहा। विष्णु ने यह कहकर अनिच्छा प्रकट की कि वह उनकी मां है। देवी को क्रोध आया और विष्णु को भी जलाकर राख कर दिया। देवी ने तीसरी बार हथेलियां रगड़ीं और तीसरी चमक में तीसरा पुत्र उत्पन्न हुआ। वह थे शिव। देवी ने शिव से विवाह करने के लिए कहा। शिव ने कहा ‘‘मैं तुम्हें दूसरा शरीर धारण कराता हूं।’’ देवी तैयार हो गई। तभी शिव की दृष्टि राख के दो ढेरों पर पड़ी। देवी ने कहा ये तुम्हारे दो भाई हैं जिन्हें मैंने जलाकर राख कर दिया क्योंकि उन्होंने मुझसे विवाह करने से इंकार कर दिया था। इस पर शिव ने कहा, ‘‘मैं अकेला कैसे विवाह कर सकता हूं? आप दो स्त्रियां और उत्पन्न करें जिससे हम तीनों का विवाह हो सके’’। देवी ने वैसा ही किया जैसा शिव ने कहा था और तीनों देवों ने देवी, और उसके द्वारा उत्पन्न दो देवियों से विवाह कर लिया। इस कथा के दो बिन्दु हैं। एक यह कि शिव ने यद्यपि पापकर्म किया तब भी इस भय से वे अधिक पाप नहीं कर पाए कि कहीं अपने दोनों प्रतिद्वंद्वियों की अपेक्षा उनकी प्रतिष्ठा गिर न जाए। और भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश का स्थान नीचे आ गया क्योंकि वे देवी द्वारा उत्पन्न हुए।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव के उत्थान-पतन के विश्लेषण के पश्चात् दो नए देवों कृष्ण और राम के संबंध में उलट-फेर पर विचार करना शेष है।

ब्रह्मा, विष्णु और महेश की अपेक्षा कृष्ण की उपासना में कुछ कृत्रिमताएं हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जन्मजात भगवान थे। कृष्ण एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें भगवान मान लिया गया। उन्हें कदाचित इस कारण देवत्व प्राप्त हुआ कि उन्हें विष्णु का अंशावतार माना जाता है। ख्1, परन्तु इसके बावजूद उन्हें उनके दुराचार के कारण, जो उन्होंने गोपियों के साथ किया, अपूर्ण अवतार माना जाता है। यदि वह विष्णु के पूर्ण और विशुद्ध अवतार होते तो उनके वह कर्म अक्षम्य होते।

इसके बावजूद सामान्य पुरुष कृष्ण सर्वोपरि बन गए। श्रीकृष्ण कितने महान बन गए, वह भगवतगीता के अध्याय दस और चौदह से परिलक्षित है। इन अध्यायों में कृष्ण कहते हैंः

‘‘हे कुरुश्रेष्ठ, अब (मैं) तेरे लिए अपनी दिव्य विभूतियों को प्रधानता से कहूंगा क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है। हे गुडाकेश (अर्जुन), मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूं तथा (सम्पूर्ण) भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूं। मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु अर्थात् वामन अवतार (और) ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूं तथा मैं (उनचास) वायु देवताओं में मरीचि नामक वायु देवता, (और)

  1. देखें म्यूर, खंड 4, पृ. 49