88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नक्षत्रों में नक्षत्र का अधिपति चन्द्रमा हूं। वेदों में सामवेद हूं, देवों में इन्द्र हूं और इन्द्रियों में मन हूं। भूतप्राणियों में चेतना अर्थात् ज्ञान-शक्ति हूं।
एकादश रुद्रों में शंकर हूं और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूं और मैं आठ वसुओं में अग्नि हूं (तथा) शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूं। पुरोहितों में मुख्य अर्थात् बृहस्पति हूं। तू मुझ को जान। हे पार्थ! सेनापतियों में मैं स्वामी, कात्ति्र्ाकेय और जलाशयों में समुद्र हूं। मैं महर्षियों में भृगु (और) वचनों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूं। तथा सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पर्वत हूं। सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष और देवऋषियों में नारद मुनि (तथा) गंधर्वों में चित्ररथ (और) सिद्धों में कपिल मुनि हूं। घोड़ों में अमृत से उत्पन्न उच्चैश्रवा नामक घोड़ा, हाथियों में ऐरावत नामक हाथी तथा मनुष्यों में राजा मुझे ही जान। मैं शस्त्रों में वज्र और गऊओं में कामधेनु हूं और (शास्त्रोक्त रीति से) संतान की उत्पति हेतु कामदेव हूं। सर्पों में सर्पराज वासुकि हूं। मैं नागों में शेषनाग और जलचरों में उनका अधिपति जल देवता हूं और पितरों में अर्चना नामक पित्रेश्वर (तथा) शासन करने वालों में यमराज मैं हूं। मैं दैत्यों में प्रहलाद और गणनाकारों में मृत्यु का स्वामी (काल, समय) हूं तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूं।
‘‘मैं पवित्र करने वालों में वायु (और) शस्त्रधारियों में राम हूं तथा मछलियों में मगरमच्छ हूं, नदियों में भागीरथी गंगा हूं। हे अर्जुन! सृष्टियों में आदि, अंत और मध्य भी मैं ही हूं तथ मैं विद्याओं में आध्यात्मिक विद्या अर्थात् ब्रह्म विद्या (एवं) परस्पर में विनोद करने वालों में तत्व निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूं। मैं अक्षरों में आकार, समासों में द्वंद्व हूं, (तथा) अक्षय काल अर्थात् काल का भी महाकाल और विराट स्वरूप, सबका धारण करने वाला (भी) मैं ही हूं। तथा मैं गेय श्रुतियों में बृहत्साम, छंदों में गायत्री छंद, महीनों में मार्गशीर्ष का महीना और ऋतुओं में वसंत ऋतु मैं ही हूं। मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूं, (तथा) मैं जीतने वालों की विजय हूं और निश्चय करने वालों का निश्चय, सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूं। वृष्णि वंशियों में वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तुम्हारा सखा और पाण्डवों में धनंजय एवं मुनियों में वेद व्यास, कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूं। मैं दमन करने वालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूं। जीतने की इच्छा करने वालों की नीति हूं। (और) गोपनीय भावों में मौन हूं और ज्ञान वालों का तत्वज्ञान मैं ही हूं और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूं क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है जो मुझ से रहित हो।
‘‘जो तेज सूर्य में स्थित हो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो (तेज) चन्द्रमा में स्थित है और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान। मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूं और