ग्यारहवीं पहेली
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रसस्वरूप अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को पुष्ट करता हूं। मैं ही सब
प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ, वैश्वानर अग्नि रूप होकर प्राण और अपान में
युक्त हुआ चार प्रकार के अन्न को पचाता हूं और मैं ही सब प्राणियों के हृदय
में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूं। मेरे से ही स्मृति-ज्ञान प्रकट होता है और सब
वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूं। वेदांत का कर्ता और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूं,
संसार में नाशवान और अविनाशी दो प्रकार के पुरुष हैं उनमें सम्पूर्ण भूत-प्राणियों
के शरीर तो नाशवान हैं और जीवात्मा अविनाशी कही जाती है, उत्तम पुरुष तो
अन्य ही हैं जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका भरण-पोषण करता है एवं
अविनाशी परमात्मा कहलाता है क्योंकि मैं नाशवान का प्रणेता हूं। सर्वथा अतीत
हूं और (माया में स्थित) अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूं, इसलिए लोक में
और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूं।’’
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जहाँ तक गीता का संबंध है, कृष्ण से महानतम कोई नहीं है। वह अन्य सभी देवों से उत्तम है।
अब हम महाभारत पर आते हैं। हम क्या देखते हैं? हमें कृष्ण की स्थिति बदली हुई नजर आती है। वहां उनकी स्थिति में उत्थान-पतन की कथा है। पहले कृष्ण का स्थान शिव के ऊपर है। यही नहीं। शिव से निम्न भी पाते हैं और उन्हें शिव की श्रेष्ठता स्वीकार करनी होती है। कृष्ण की श्रेष्ठता प्रमाणित करने के संबंध में एक प्रमाण यह भी है वह है अनुशासन पर्व ख्1, में यह उल्लेख-
‘‘भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मा जी से भी श्रेष्ठ हैं। वे सनातन पुरुष श्रीहरि कहलाते हैं।
उनके शरीर की कांति जाम्बुनद नामक स्वर्ण के समान देदीप्यमान है। बिना बादल
के आकाश में उदित सूर्य के समान तेजस्वी हैं। उनकी भुजाएं दस हैं, उनका तेज
महान है। वे देवताओं के शत्रु दैत्यों का नाश करने वाले हैं। उनके वक्षःस्थल
में श्रीवत्सका चिन्ह शोभा पाता है। वे हृषीक अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी होने के
कारण हृषीकेश कहलाते हैं। सम्पूर्ण देवता उनकी पूजा करते हैं। ब्रह्माजी उनके
उदर से और मैं उनके मस्तक से प्रकट हुआ हूं। उनके सिर के बालों से नक्षत्रों
और ताराओं का प्रदुर्भाव हुआ है। देवता और असुर उनके शरीर की रोमावलियों
से प्रकट हुए हैं। समस्त ऋषि और सनातन लोक उनके श्रीविग्रह से उत्पन्न हुए
हैं। वे श्री हरि स्वयं ही सम्पूर्ण देवताओं और ब्रह्मा जी के भी धाम हैं। सम्पूर्ण
पृथ्वी के स्रष्टा और तीनों लोकों के स्वामी भी वे ही हैं। वे ही समस्त चराचर
प्राणियों का संहार करते हैं। वे देवताओं में श्रेष्ठ, देवताओं के रक्षक, शत्रुओं का
संताप देने वाले, सर्वज्ञ, सबमें ओतप्रोत, सर्वव्यापक और सब ओर मुखों वाले हैं।
वे ही परमात्मा, इन्द्रियों के प्रेरक और सर्वव्यापी महेश्वर हैं। तीनों लोकों में उनसे
- म्यूर, खंड 4, पृ. 273-74