ग्यारहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने देवताओं का उत्थान-पतन क्यों किया? - Page 105

90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। वे ही सनातन, मधुसूदन और गोविन्द आदि नामों से

प्रसिद्ध हैं। सज्जनों के आदर देने वाले, वे भगवान श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध में

सम्पूर्ण राजाओं का संहार करायेंगे। वे देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए

पृथ्वी पर मानव-शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं। उनकी शक्ति और सहायता के

बिना सम्पूर्ण देवता भी कोई कार्य नहीं कर सकते। संसार में नेता के बिना देवता

कोई भी कार्य करने में असमर्थ हैं। और यह भगवान श्रीकृष्ण सब प्राणियों के

नेता हैं, इसलिए समस्त देवता उनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं।

देवताओं की रक्षा और उनके कार्य-साधन में संलग्न रहने वाले वे भगवान

वासुदेव ब्रह्मस्वरूप हैं। वह ही ब्रह्मऋषियों को सदा शरण देते हैं। ब्रह्मा जी और

मैं दोनों ही उनके शरीर के भीतर उनके गर्भ में बड़े सुख के साथ रहते हैं।

उनके श्रीविग्रह में सम्पूर्ण देवता भी सुखपूर्वक निवास करते हैं। उनकी आँखें

कमल के समान सुंदर हैं। उनके गर्भ (वक्षःस्थल) में लक्ष्मी का वास है। वे

सदा लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं। देवताओं के कल्याण हेतु गोविंद मनु के

वंश के होने चाहिए। उनमें श्रेष्ठ बुद्धिमत्ता है और प्रजापति के उत्कृष्ट मार्ग पर

अग्रसर हैं। जिनमें धर्मपरायणता के सभी लक्षण विद्यमान हैं। यह दक्ष ब्राह्मणों

के प्रति श्रद्धालु हैं, इसमें विख्यात वीर हुए हैं जिनमें सदाचार के श्रेष्ठ गुण

विद्यमान हैं जो धर्मप्राण विशुद्ध क्षत्रियों के वीरोचित गुण हैं। ये अनकदुंदुभी के

वंशज हैं जिन्हें अपनी जाति को वासुदेव के रूप में पोषित किया। वासुदेव के

यहां चतुर्भुज का जन्म होना चाहिए, वासुदेव उदारचेता ब्राह्मण सेवी हैं। ब्रह्मा के

समक्ष उनकी छवि ब्राह्मण प्रिय की है।’’

‘‘हे देवताओं इस देव की यथेष्ठ पूजा करो जैसी कि अविनाशी ब्रह्मा की की जाती

है। उन्हें श्रद्धा के पुष्पहार चढ़ाओ। जो मुझे पिता ब्रह्मा के रूप में पाना चाहते हैं।

वे इस दैवी गौरवान्वित वासुदेव को नमन करें। इस विषय में मैं निसंकोच कहता हूं

इनके दर्शन मेरे दर्शन हैं अर्थात् पिता ब्रह्मा के दर्शन तप ही इनका धन है।’’

अब हमें यह देखना है कि कृष्ण को देवताओं में पहले सर्वश्रेष्ठ बाद में पतित कैसे घोषित कर दिया गया।

महाभारत में अनेक ऐसी घटनाओं का वर्णन है, जिनसे कृष्ण शिव की अपेक्षा हीन स्थान पर रखे गये हैं, उन सबका वर्णन तो करना कठिन है लेकिन कुछ को गिना जा सकता है।

पहली घटना तो यह है जब अर्जुन ने अगले दिन जयद्रथ का वध किया, उन्होंने शपथ ली थी तो अर्जुन बड़े कुण्ठित हो गए थे क्योंकि उनके मन में यह आशंका थी कि जयद्रथ के मित्र उसकी रक्षा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे और जब तक अर्जुन को ऐसा अस्त्र उपलब्ध न हो जाए, जिससे जयद्रथ का वध किया जा