ग्यारहवीं पहेली
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सके तो अर्जुन परामर्श के लिए कृष्ण के पास जाते हैं। कृष्ण अर्जुन को सलाह देते हैं कि वे महादेव से पाशुपत अस्त्र प्राप्त करें जिस अस्त्र से शिव ने स्वयं दैत्यों का संहार किया था। यदि वे इसे प्राप्त कर लेते हैं तो निश्चय ही जयद्रथ का वध किया जा सकता है।
महाभारत के द्रोण पर्व में इसका उल्लेख इस प्रकार हैः
उनके पास पहुँचकर धर्मपरायण भगवान कृष्ण और पृथा पुत्र अर्जुन ने पृथ्वी पर मस्तक टेक कर वेद मंत्र पढ़ते हुए उन्हें प्रणाम किया। विश्व नियंता, अनन्त, अविनाशी देव के रूप में उनकी अभ्यर्थना की जो परम ज्ञान के स्रोत हैं, आकाश, वायु, नक्षत्रों, सागर के सृष्टा हैं, पृथ्वी के परम श्रेष्ठ तत्व हैं, देवों, दानवों, यक्षों, मानवों के सृजक हैं, साधना के परम ब्रह्म, ज्ञानियों के लिए तत्व ज्ञान का भण्डार हैं। विश्व के निर्माता और संहारक हैं, सूर्य और इन्द्र के जनक हैं। तब कृष्ण ने उन्हें श्रद्धापूर्वक सम्बोधित किया। ये दोनों योद्धा शिव की शरण में आए। अर्जुन ने बार-बार उनकी स्तुति की क्योंकि वे सभी जीवों के सृष्टा थे और त्रिकाल दर्शी थे। उन दोनों नर और नारायण को आया देख भगवान शिव बड़े प्रसन्न हुए और हंसते हुए बोले ‘‘वीरवरो, तुम दोनों का स्वागत है! उठो, विश्राम करो और शीघ्र बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है? तुम जिस काम के लिए आये हो, उसे मैं अवश्य पूर्ण करूंगा’’।
भगवान शिव की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों हाथ जोड़ खड़े हो
गये और उनकी स्तुति करने लगे ‘‘भगवान’ आप ही संसार के स्वामी, सबके
सृष्टा, एवं सर्व व्यापा हैं, आपको हम बारंबार नमस्कार करते हैं। आप भक्तों
पर दया करने वाले हैं, प्रभो! हमारा मनोरथ सिद्ध कीजिये।’’ तदनन्तर अर्जुन ने
मन ही मन भगवान शिव और श्रीकृष्ण का स्मरण किया तथा शंकर जी से कहा
‘‘भगवन! मैं दिव्य अस्त्र चाहता हूं।’’ यह सुनकर भगवान शंकर मुसकराये और
कहने लगे ‘‘श्रेष्ठ पुरुषो। मैं तुम दोनों का स्वागत करता हूं। तुम्हारी अभिलाषा
मालूम हुई, तुम जिसके लिये आये हो वह वस्तु अभी देता हूं। यहां से निकट
ही एक अमृतमय दिव्य सरोवर है, उसी में मैंने अपने दिव्य धनुष और बाण रख
दिये हैं, वहां जाकर बाण-सहित धनुष ले आओ।’’
‘‘बहुत अच्छा’’! कहकर दोनों वीर शिवजी के पार्षदों के साथ उस सरोवर पर गये।
वहाँ जाकर उन्होंने दो नाग देखे, एक सूर्यमंडल के समान प्रकाशमान था और दूसरा
हजार मस्तकवाला था, उसके मुख से आग की लपटें निकल रही थीं। श्रीकृष्ण और
अर्जुन दोनों उस सरोवर के जल का आचमन करके उन नागों के पास उपस्थित
हुए और हाथ जोड़कर शिवजी को प्रणाम करते हुए, रुद्रीय पाठ करने लगे। तब
भगवान शंकर के प्रभाव से वे दोनों महानाग अपना स्वरूप छोड़कर धनुष बाण
हो गये। इससे वे दोनों बड़े प्रसन्न हुए और उस देदीप्यमान धनुष बाण को लेकर
शंकरजी के पास आये। वहां आकर उन्होंने वे अस्त्र शंकर जी को अर्पण कर दिये।