92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तत्पश्चात् शंकरजी ने प्रसन्न होकर अपना पाशुपत नामक घोर अस्त्र अर्जुन को दे
दिया। उसे पाकर अर्जुन के हर्ष की सीमा न रही, उनके शरीर में रोमांच हो आया।
वे अपने को कृतकृत्य मानने लगे। फिर कृष्ण और अर्जुन दोनों ने भगवान शिव को
प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वे अपने शिविर में चले आये।’’
महाभारत के ही अनुशासन पर्व में युधिष्ठर और भीष्म का संवाद आया है। युधिष्ठर भीष्म से महादेव के गुणों के विषय में जिज्ञासा करते हैं। भीष्म का उत्तर इस प्रकार थाः
‘‘मैं महादेव की लीलाओं और गुणों की व्याख्या करने में असमर्थ हूं, जो अनीश्वर हैं, वे अगोचर हैं, वह ही ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के जनक हैं, जिनकी देवताओं में ब्रह्मा से लेकर पिशाच तक उपासना करते हैं, वे अमृत तत्व हैं और वही पुरुष हैं। ऋषि उनकी उपासना करते हैं और योगमंत्रों में स्तवन किया गया है। वे सत्य के सूक्ष्म तत्व हैं। वे अजर-अमर ब्रह्म हैं। वे विद्यमान भी हैं और अविद्यमान भी। उन्होंने शक्ति से आत्म-तत्व प्राप्त किया है और वे देवाधिदेव और प्रजापतियों के स्वामी हैं। मेरे जैसा मानव जो माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ है और जो मृत्यु को प्राप्त होने योग्य है, वह ‘भव’ के गुणों का क्या बखान कर सकता है। उसका वर्णन तो मात्र नारायण कर सकते हैं। विष्णु मेधावी हैं, सर्वगुण सम्पन्न हैं, दुर्जेय हैं, दिव्य दृष्टि हैं, दिव्य शक्ति हैं, यद्यपि रुद्र के लिए उनकी भक्ति भगवान कृष्ण ने भी की है। बद्री में महादेव से कृष्ण ने सर्वस्व प्राप्त किया। माधव ने एक हजार वर्ष तक शिव की उपासना में तप किया परन्तु इहलोक में महेश की कृष्ण द्वारा आराधना की जाती है। ऐसे कृष्ण, जब प्रजावृद्धि चाहते हैं, तो वे देवाधिदेव आदि के नाम का जाप करते हैं।’’
कृष्ण की उपस्थिति में युधिष्ठिर और भीष्म का यह संवाद चलता है। भीष्म उत्तर देने के उपरांत कृष्ण को महादेव की श्रेष्ठता बताते हैं और यह आश्चर्य है कि यह महानतम देवता कृष्ण बिना किसी हिचक और विरोध के यह सब मान लेता है और कहता हैः
‘‘वास्तव में, ईश (महादेव) के गुण-कर्मों को कौन जान सकता है। हिरण्यगर्भ
में विराजमान देव, न इन्द्र के साथ महान ऋषि, न आदित्यगण, जो सूक्ष्मतम के
ज्ञाता हैं यह नहीं जान पाए, तब भला शेष ऋषिगण और मनुष्य यह कैसे समझ
पाएंगे। असुरों के हंता इस देवाधिदेव के गुणों का मैं बखान करूंगा, जो सब
धार्मिक अनुष्ठानों के स्वामी हैं।’’
यहां यह स्पष्ट है कि कृष्ण अपने को शिव से हीन समझते हैं। साथ ही शिव जानते हैं कि कृष्ण का महान देवता पद से पतन हो चुका है, बराबरी की तो दूर रही सौप्तिक - पर्व में महादेव अश्वत्थामा ख्1, को बताते हैंः
‘‘मेरी कृष्ण ने विधिवत् पूजा की है, जो कार्यकुशल है, सत्यता के साथ, पवित्रता,
- म्यूर द्वारा उद्धृत (पृ. सं. नहीं दी गई)।