ग्यारहवीं पहेली
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ईमानदारी, उदारता, अत्यंत सरलता, अनुष्ठान, धैर्य, बुद्धि, आत्मसंयम, निष्ठा और
विचारपूर्वक। आज से कृष्ण से अधिक और कोई मुझे प्रिय नहीं है।’’
शिव ही क्या, हर देवता से श्रेष्ठतम कृष्ण, जो वास्तव में परमेश्वर थे, यहां शिव के मात्र अनुयायी बना दिए जाते हैं जो मामूली सा वरदान मांगते फिरते हैं।
कृष्ण के पतन की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। उन्हें और भी अपमान सहन करने पड़ते हैं। कृष्ण शिव के मुकाबले अपना दर्जा नीचे स्वीकार कर लेते हैं। यहां तक कि वे उपमन्यु के अनुयायी बन जाते हैं जो कि महान् शिव-भक्त हैं। कृष्ण उससे शैवमत की दीक्षा ग्रहण करते हैं। कृष्ण स्वयं कहते हैंः
‘‘शास्त्रानुसार’’ आठवें दिन उस ब्राह्मण (उपमन्यु) ने मुझे दीक्षित किया। मैंने सिर का
मुंडन कराया, घी से विलेपन किया, बाहों में कुश दूर्वा ग्रहण की, कटि तक अधोवस्त्र
धारण किए। कृष्ण तब प्रायश्चित करते हैं और महादेव के दर्शन करते हैं।
क्या ईश्वर जैसी पदवीं प्राप्त देवता का इससे अधिक पद में पतन और कहीं दृष्टिगोचर होता है? कृष्ण जो परमेश्वर कहे जाते हैं, जिनकी शिव से तुलना की जाती है, वे एक मात्र परमेश्वर नहीं थे और बाद में तो वे ईश्वर रहे भी नहीं। वे शिव के भक्त बन गए और उपमन्यु जैसे साधारण ब्राह्मण से शैवधर्म की दीक्षा भी ली।
जहां तक राम का प्रश्न है, ये भी वैसे ही नामधारी कृत्रिम भगवान हैं जैसे कि श्रीकृष्ण। राम को तो आभास भी नहीं था कि वह परमेश्वर हैं। जब लंका में सीता रावण-विजय के बाद उनके पास आई और जब उनसे सीता के विषय में बात की गई तो राम को सीता की पवित्र्ता पर संदेह हुआ। वे बड़े दुखी हुए। रामायण में यह प्रसंग इस प्रकार हैः
‘‘इसी समय यक्षराज कुबेर, पितरों सहित यमराज देवताओं के स्वामी सहस्त्र
नेत्रधारी इन्द्र, जल के अधिपति वरुण, त्रिनेत्रधारी तेजस्वी वृषभवाहन के स्वामी
महादेव, संपूर्ण जगत के स्रष्टा ब्रह्मा, वेद के ज्ञाता, (स्वर्ग से राजा दशरथ) जो
सभी सूर्यतुल्य देदीप्यमान् विमानों से लंकापुरी में पधारे राघव (राम) के समक्ष
प्रकट हुए। भगवान श्रीराम उनके सामने हाथ जोड़े खड़े थे। वे श्रेष्ठ देवता आभूषणों
से अलंकृत अपनी विशाल भुजाओं को उठाकर उनसे बोले, ‘‘राम, आप सम्पूर्ण
विश्व के सृष्टा, ज्ञानियों में श्रेष्ठ और सर्वव्यापक हैं। फिर इस समय अग्नि में
प्रविष्ट सीता की उपेक्षा कैसे कर रहे हैं। आप समस्त देवताओं में श्रेष्ठ विष्णु
ही हैं, इस बात को कैसे नहीं समझ रहे हैं। पूर्वकाल में वसुओं के प्रजापति जो
ऋतधाम नामक वसु थे।, वे आप ही हैं। आप तीनों लोकों के आदिकर्ता, स्वयं
प्रभु हैं। रुद्रों में आठवें रुद्र और साध्यों में पांचवें साध्य भी आप ही हैं। आश्विन
आपके कान हैं, और सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं।’’
‘‘शत्रुओं को संताप देने वाले देव, सृष्टि के आदि, अन्त और मध्य में आप ही दिखाई