94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
देते हैं। फिर आप सीता की एक साधारण मनुष्य की भांति उपेक्षा कर रहे हैं।’’
उन लोकपालों के ऐसा कहने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ राम ने आश्चर्यचकित हो उन श्रेष्ठ देवताओं से कहाः
‘‘देवगण! मैं तो अपने को मनुष्य, दशरथपुत्र राम ही समझता हूं। देवगण बताएं, मैं कौन हूं और कहां से आया हूं।’’
ऐसा कहने पर ब्रह्मा जी ने राम को कहाः
‘‘सत्यपराक्रमी, आप मेरे सत्य वचन सुनें। आप दिव्य शक्तियों से अभिभूत हैं। आप चक्र धारण करने वाले सर्वसमर्थ नारायण देव हैं, एक दाढ़ वाले पृथ्वी-धारी वाराह हैं तथा देवताओं के भूत एवं भावी शत्रुओं को जीतने वाले हैं। आप अविनाशी परब्रह्म हैं। सृष्टि के आदि, मध्य और अंत में सत्य से विद्यमान हैं। आप ही लोकों के परम धर्म हैं। आप ही विश्वकसेन (विष्णु), चतुर्भुज, आप ही धनुर्धारी हैं। आप ही सारंग, हृषीकेश, अन्तर्यामी, आदि पुरुष और पुरुषोत्तम हैं। आप किसी से पराजित नहीं होते। आप अपराजेय खड्गधारी विष्णु एवं महाबली कृष्ण हैं। आप ही देव सेनापति तथा परम सत्य हैं। आप ही बुद्धि, सत्व, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह तथा सृष्टि एवं प्रलय के कारण हैं। आप ही उपेन्द्र (वामन) और मधुसूदन हैं। इन्द्र को भी उत्पन्न करने वाले महेन्द्र और युद्ध का अन्त करने वाले शांतस्वरूप पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षिगण आपको शरणदाता तथा शरणागत वत्सल बताते हैं। आप ही सहस्त्रों शाखारूप सींग तथा सैकड़ों विधिवाक्य रूप मस्तकों से युक्त वेदरूप महावृषभ हैं। आप ही तीनों लोकों के आदिकर्ता और स्वयंप्रभु (परम स्वतंत्र) हैं। आप सिद्ध और साध्यों के आश्रय तथा पूर्वज हैं यज्ञ, षट्कार और ओंकार भी आप ही हैं। आप श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ परमात्मा हैं। आपके आविर्भाव और तिरोभाव को कोई नहीं जानता। आप कौन हैं, इसका भी किसी को पता नहीं है। समस्त प्राणियों, गौओं तथा ब्राह्मणों में भी आप ही दिखाई देते हैं। समस्त दिशाओं में, आकाश में, पर्वतों में और नदियों में भी आपकी ही सत्ता है। आपके सहस्त्रों चरण, सैकड़ों मस्तक और सहस्त्रों नेत्र हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियों को, पृथ्वी का अंत हो जाने पर आप ही जल के ऊपर महान सर्प शेषनाग के रूप में दिखाई देते हैं। श्रीराम, आप ही तीनों लोकों को तथा देवता, गन्धर्व और दानवों को धारण करने वाले विराट पुरुष नारायण हैं। सबके हृदय में रमण करने वाले परमात्मा हैं। मैं ब्रह्म आपका हृदय हूं और देवी सरस्वती आपकी जिह्वा है। प्रभो! मुझ ब्रह्म ने जिनकी सृष्टि की है, वे सब देवता आपके विराट शरीर में रोम हैं। आपके नेत्रों का बंद होना रात्रि, खुलना ही दिन है। वेद आपके संस्कार हैं। आपके बिना इस जगत का अस्तित्व नहीं है। सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है। पृथ्वी आपकी स्थिरता है। अग्नि आपका कोप है और चन्द्रमा प्रसन्नता है। वक्षःस्थल में श्रीवत्स चिन्ह धारण करने वाले भगवान विष्णु आप ही हैं। पूर्वकाल में (वामनावतार के समय) आपने ही अपने तीन पगों में तीनों लोक नाप लिये थे। आपने अत्यंत दारुण दैत्यराज बलि को बांधकर इन्द्र को तीनों लोकों का