ग्यारहवीं पहेली
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राजा बनाया था। सीता साक्षात लक्ष्मी है और आप भगवान विष्णु हैं। आप ही सच्चिदानंद भगवान श्रीकृष्ण एवं प्रजापति हैं। मनुष्य आपको ही सृष्टि का पालक, सृष्टा, और संहार का परम स्रोत मानते हैं।
यह स्पष्ट है कि राम को जान-बूझकर कृत्रिमतापूर्वक भगवान बता दिया गया, जैसे कृष्ण एक मानव से भगवान बना दिए गए। ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तरह वे जन्मजात भगवान नहीं थे। उन्हें ब्राह्मणों के नायक परशुराम से भी हीन सिद्ध किया गया। रामायण में यह कथा इस प्रकार आती हैः
‘‘जब राजा दशरथ मिथिलापति जनक, जिनकी पुत्री से अभी राम का विवाह
हुआ था, से विदा लेकर अपने राज्य को लौट रहे थे तो उनके समक्ष अनेक
अपशकुन हुए। उनके चारों ओर भयंकर स्वर वाले पक्षी चीत्कार उठे और भूमि
पर विचरने वाले मृग दाहिनी ओर चलने लगे। यह देखकर दशरथ ने वशिष्ठ से
पूछा, ‘‘पक्षी चीख रहे हैं और मृग दाहिनी ओर चल रहे हैं। यह शकुन शुभ भी
है और अशुभ भी है। यह क्या बात है? इससे मेरा हृदय शंका से भर उठता है।’’
तब वशिष्ठ बोले, ‘‘यह परशुराम के आगमन की चेतावनी है जो तूफान की तरह
आ रहे हैं, बड़े भयानक दिखाई दे रहे हैं, कंधे पर फरसा और धनुषबाण हैं।’’
दशरथ ने उनका आदरपूर्वक अभिवादन किया, जिसे परशुराम ने स्वीकार कर
लिया और दशरथ पुत्र राम की ओर बढ़े। कहा, राम् तुम्हारा बहुत पराक्रम सुना
है। जनक द्वारा दिया गया शिव धनुष तुमने तोड़ दिया है। मैं दूसरा धनुष लेकर
आया हूं। इसकी प्रत्यंचा खींचकर बाण चढ़ाओ। बाण चढ़ाने में तुम्हारे बल का
अनुमान लगाकर ही मैं तुम्हारे साथ द्वन्द्व करूंगा।’’
‘‘राम ने उत्तर दिया कि यद्यपि उनके विरोधी ने उनकी युद्धप्रियता की निंदा की
है तथापि वे उन्हें अपनी शक्ति का परिचय देंगे। तब उन्होंने क्रोध में परशुराम
का धनुष छीन लिया और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी और चुनौती देने वाले परशुराम
से कहा कि मैं उन पर प्रहार नहीं करूंगा क्योंकि वे एक ब्राह्मण हैं। फिर उनके
परिजन विश्वामित्र का भी ध्यान है। परंतु मैं उनकी मानवेतर शक्ति को क्षीण कर
दूंगा, विचरण शक्ति समाप्त कर दूंगा अथवा उनकी तपस्या के बल को नष्ट कर
दूंगा। इस अवसर पर देवतागण प्रकट हुए। परशुराम बुझ से गए और शक्तिहीन हो
गए और दीन भाव से कहा कि उनके विचरण की शक्ति से उन्हें वंचित न करें
नहीं तो वे कश्यप को दिया गया वह वचन पूरा नहीं कर पाएंगे कि वे प्रत्येक
रात्रि को उनके पास पहुंचेंगे। उनकी यह सहजता नष्ट हो जायेगी।’’
इस अपवाद के अतिरिक्त राम की किसी भी अन्य देवता से कोई शत्रुता नहीं थी। वह जहां भी रहे, सब प्रबंध करते रहे। अन्य देवों की कथाएं भिन्न हैं। ब्राह्मणों के हाथों वे गरीब प्राणी, मात्र खिलौने बनकर रह गए। ब्राह्मणों ने देवताओं के साथ इस प्रकार का घटिया व्यवहार क्यों किया?