98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सुंदरी अवतरित हुई, जो नील कमल की पंखुडि़यों के समान थी और रत्नाभूषण्
ों से अलंकृत थी। वह तुरंत ब्रह्मा, विष्णु और महेश के आगे नतमस्तक हो गई।
जब उन्होंने पूछा कि वह कौन है और उसमें तीन श्यामल, श्वेत, लाल वर्ण क्यों
हैं, उसने कहा, मैं आपकी दृष्टि से उत्पन्न हुई हूं। क्या आप अपनी सर्वशक्तिमान
ऊर्जा से परिचित नहीं? ब्रह्मा ने उसकी प्रशंसा में कहा, ‘‘तेरा नाम त्रिकाल (भूत,
वर्तमान और भविष्य) की देवी रहेगा, संसार की पालक होगी और विभिन्न पूजाओं
में तेरी पूजा होगी क्योंकि तू अपने भक्तों के मनोरथ पूरे करेगी। परन्तु हे देवी!
तू अपने वर्णों के अनुसार तीन भाग कर ले। तब ब्रह्मा के कहे अनुसार उसने
अपने रंगों के अनुसार तीन भाग कर लिए, एक श्वेत, दूसरा लाल और तीसरा
श्याम। पहली अनिंद्य सुन्दरी सरस्वती थी और सृष्टि रचना में उसने ब्रह्मा का
हाथ बंटाया, लाल वर्ण की विष्णुप्रिया लक्ष्मी थी, जिसने विश्व का पालन किया,
तीसरी पार्वती थी, जिससे शिव को अनेक गुण और शक्ति प्राप्त हुई।
यह बताने का प्रयास किया गया है कि सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती एक ही देवी के तीन रूप हैं। हमें ध्यान रहता है कि सरस्वती ब्रह्मा की पत्नी है। लक्ष्मी विष्णु की और पार्वती शिव की और ब्रह्मा, विष्णु और शिव के बीच संघर्ष भी हुआ। वाराह पुराण की यह व्याख्या बेतुकी लगती है।
गौरी कौन है? पुराण कहता है गौरी पार्वती का दूसरा नाम है। पार्वती गौरी ख्1, क्यों कहलाई? इसका कारण है कि जब शिव और पार्वती कैलास पर्वत पर रहते थे तो उनके बीच कई बार झगड़ा हो जाता था। एक बार शिव ने उन्हें श्याम रंग की बता कर निंदा की। इस कटाक्ष से वह इतनी दुःखी हुई कि घने जंगलों में चली गई और घोर तपस्या की। अंत में बह्मा प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया जिससे उनका वर्ण कुन्दन जैसा हो गया। इस कारण वह गौरी के नाम से विख्यात हुई।
दूसरी देवियों के विषय में यह निश्चित नहीं कि वे एक ही देवी के पर्यायवाची नाम हैं अथवा इन नामों की भिन्न-भिन्न देवियां हैं। महाभारत में अर्जुंन ने दुर्गा के विषय में एक श्लोक पढ़ा जिसके अनुसार वह कहता है ख्2, ः
तेरा नमन है, सिद्ध सेनानी, भद्रे, मंदरावासिनी, कुमारी, काली, कपाली, कपिला, कृष्ण पिंगला, तेरा नमन है, भद्रकाली, तेरा नमन है, महाकाली, चण्डी, चण्ड, तारिणी, वारावारुणी, (सुन्दर-रंगरंजित), हे महाभाग्या कल्याणी, ओ कराली, ओ विजया, ओ जया, कृष्ण की अनुजा, महिषारक्त पायी, ओ उमा, शाकम्भरी, तू गौरांग, तू श्यामलांग,
विलकिस, पृ. 289-90
वही. पृ. 306-7