बारहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने देवताओं का मुकुट क्यों उतारा और देवियों की ताजपोशी की? - Page 114

बारहवीं पहेली

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ओ कैटभ हंता, ओ विज्ञान, तू वेदों की कला-ज्ञान है, सभी भूतों की महानिद्रा, ओ स्कंद (कार्तिकेय) जननि, देवी दुर्गा कमलासिनी, तू महादेवी है। मैं शुद्ध हृदय से महादेवी की स्तुति करता हूं, तेरी कृपा से मैं युद्ध में विजयी होऊं।

इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि यह देवियों का उपरोक्त उल्लेख मात्र वे दुर्गा के ही पर्याय हैं साथ ही दसभुजा, सिंहवाहिनी, महिषासुरमर्दिनी, जगद्धात्री, छिन्नमस्तिका, जगत गौरी, प्रत्यागिरी, अन्नपूर्णा, दुर्गा के ही नाम हैं या उनके विभिन्न रूप हैं।

इस प्रकार दो प्रधान देवियां हैं। एक पार्वती और दूसरी दुर्गा। बाकी उन्हीं के नाम हैं। पार्वती दक्ष प्रजापति की पुत्री और शिव की पत्नी है। दुर्गा कृष्ण की बहिन और शिव पत्नी है। दुर्गा और काली के विषय में पता नहीं चलता। अर्जुन द्वारा पढ़े गए श्लोक में दुर्गा और काली एक ही हैं। परन्तु लिंग पुराण में भिन्न मत प्रकट किया गया है। उसके अनुसार ख्1, काली और दुर्गा अलग-अलग हैं।

इतिहास का विद्यार्थी वैदिक और पौराणिक देवियों के बीच तुलना की उपेक्षा नहीं कर सकता जिसका उद्देश्य मात्र इतहास लिखना नहीं, उसका विश्लेषण करना भी होता है। दोनों के बीच में एक विरोधाभास है। वैदिक देवियों की उपासना मात्र औपचारिकतावश की जाती है। उनकी पूजा मात्र इसलिए की जाती है कि वे देव पत्नियां हैं। पौराणिक देवियों की पूजा भिन्न प्रकार की है। उनकी पूजा का अपना आधार है। यह नहीं कि वे देव-पत्नियां हैं। भिन्नता इसलिए है कि वैदिक-देवियां कभी रणक्षेत्र में नहीं गईं और ना ही किसी प्रकार का शौर्य-प्रदर्शन किया। पौराणिक देवियां रणचंडी हैं। और उन्होंने वीरता दिखाई है। उनकी पूजा औपचारिकता नहीं है। इसका कारण उनकी वीरता और पराक्रम है।

कहा जाता है कि दुर्गा और दो असुरों के बीच हुए घमासान युद्ध के कारण ही दुर्गा की प्रसिद्धि हुई। यह कहानी मार्कण्डेय पुराण में विस्तृत रूप से कही गई है। इसके अनुसारः ख्2,

‘‘त्रेता युग के अंत में शुंभ, निशुंभ नामक दो बलशाली असुरों ने दस हजार वर्ष तक

घोर तपस्या की। इसके कारण स्वर्ग से शिव प्रकट हुए जिन्हें पता चला कि अपनी

विलक्षण तपस्या के आधार पर वे अमरता का वरदान चाहते हैं। उन्होंने दोनों को

बहुत समझाया और इस बात का असफल प्रयास किया कि वे किसी अन्य वरदान

से संतुष्ट हो जाएं। जब उनका मनोरथ पूरा न हुआ तो उन्होंने एक हजार साल

तक और कठिन तपस्या की। शिव फिर प्रकट हुए और उनको वही वर देने से

  1. विलकिस, हिंदू माइथोलाजी, पृ. 313

  2. वही. पृ. 302-6