बारहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने देवताओं का मुकुट क्यों उतारा और देवियों की ताजपोशी की? - Page 115

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इंकार कर दिया। फिर वे सिर के बल उल्टे लटक गए और नीचे धीमी अग्नि

जला ली। उन्होंने 800 साल तक तपस्या की जब तक उनकी गर्दन से रक्त नहीं

बहने लगा। यह सोचकर कि कहीं ऐसे प्रचण्ड तप से ये हमारा सिंहासन ही न

छीन लें, देवतागण कांप उठे। देवराज ने एक सभा बुलाई और अपनी आशंका

जताई। उन्होंने स्वीकार किया कि यह गंभीर बात है परन्तु पूछा कि इसका उपाय

क्या है? इन्द्र के परामर्श पर कंदर्प (कामदेव) परम सुंदरी अप्सराओं सम्भा और

तिलोत्तमा को साथ लेकर महाबलि असुरों की कामुकता जगाने हेतु उनके पास

भेजे गए। कंदर्प ने अपने (प्रेम) बाण छोड़े और असुरों को घायल कर दिया।

ये युगल सुन्दरियों के जाल में फंस कर मोहित हो गए और तपस्या भंग कर

दी। इन सुंदरियों के साथ उन्होंने पांच हजार वर्ष बिताए। फिर उन्हें ध्यान आया

कि कामुकता के कारण उनकी अमरता की आशा पर पानी फिर गया है। उनको

संदेह हुआ कि यह जाल इन्द्र की मिलीभगत से ही बिछाया गया है, इसलिए

स्वर्ग के मोह में उन्होंने फिर पूजा आरम्भ कर दी। एक हजार वर्ष तक यह

क्रम जारी रखा, जब तक कि वे कंकाल न बन गए। शिव प्रकट हुए और उन्हें

वरदान दिया कि वे देवताओं से बढ़कर बलशाली होंगे।

देवताओं से अधिक बलशाली होकर उन्होंने उनसे युद्ध छेड़ दिया। दोनों पक्षों में

घमासान संघर्ष के पश्चात् असुर विजयी रहे। जब इन्द्र और अन्य देवताओं की

स्थिति दयनीय हो गई तो उन्होंने ब्रह्मा और विष्णु की सहायता मांगी। दोनों ने

उन्हें शिव के पास भेज दिया। शिव ने कहा कि वे कुछ करने में समर्थ नहीं

हैं। उन्हें याद दिलाया गया कि इसके कारण तो वही हैं, उन्हीं के वरदान के

फलस्वरूप वे बरबाद हो रहे हैं। तब शिव ने उन्हें देवी दुर्गा की तपस्या करने

की सलाह दी। उन्होंने ऐसा ही किया। कुछ समय पश्चात् देवी प्रकट हुई और

उन्हें वर दिया। फिर अपने-आप एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और

पानी का एक घड़ा लेकर वह देवताओं के बीच से गुजरी। फिर उन्होंने अपना

वास्तविक रूप धारण कर लिया और कहा कि तुम मेरी स्तुति करो।

यह नई देवी हिमालय पर्वत पर गई, जहां शुंभ-निशुंभ के दो दूत चण्ड-मुण्ड रहते थे। जब ये दैत्य पर्वत पर विचर रहे थे तो उन्होंने देवी को देखा और वे उसका रूप देखकर चकित रह गए। उन्होंने अपने-अपने स्वामी गण से इसका वर्णन किया और देवी को प्राप्त करने के लिए उकसाया चाहे उन्हें अपनी सारी निधियां भी न्यौछावर क्यों न करनी पड़े, जो उन्होंने स्वर्ग के देवताओं से लूटी हैं।

शुंभ ने देवी के पास सुग्रीव को संदेशवाहक के रूप में भेजा कि वह कहे कि