बारहवीं पहेली
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तीनों लोकों का सुख उसके प्रासाद में है। जो भेंट कभी देवताओं को चढ़ाई जाती थी, अब उसे चढ़ाई जा रही है। देवी ने कहा- प्रस्ताव बहुत ठीक है। परन्तु उन्होंने यह संकल्प किया है कि वह उसी से विवाह रचायेगी जो उसे युद्ध में जीतेगा और उसका मान-मर्दन करेगा।
सुग्रीव निष्फल लौटना नहीं चाहता था। उसने देवी से हामी भरवाने के लिए
गरजकर कहा ‘‘क्या वह उसके स्वामी को जानती है? जिसके समक्ष विश्व को
कोई व्यक्ति नहीं टिक सकता चाहे वह देवता हो, दैत्य हो, अथवा मनुष्य हो?
तब क्या एक स्त्री होकर वह इस प्रस्ताव को ठुकराने का दुस्साहस कर सकती
है? क्योंकि उसके स्वामी का आदेश है, वह तुम्हें उनके समक्ष तुरंत प्रस्तुत करने
को विवश कर सकता है। देवी ने कहा - यह ठीक है परन्तु उन्होंने अपना
संकल्प दोहराया और कहा कि वे अपने स्वामी को मनाएं और वह उनके साथ
अपनी शक्ति-परीक्षा करें।
दूत वापस चला गया और अपने स्वामी से सब कहा सुनाया। यह सुनकर शुंभ
क्रोध से जल उठा और कोई उत्तर दिए बिना उसने अपने सेनापति धूम्रलोचन को
बुलाया उसे हिमालय जाकर देवी को पकड़ लाने का आदेश दिया और कहा
यदि कोई रक्षा के लिए आए तो उसे वहीं नष्ट कर देना।
सेनापति हिमालय पर गया और देवी को अपने स्वामी का आदेश सुनाया। उन्होंने
मुस्कराते हुए आदेश-पालन की सलाह दी। उस वीर के आने पर देवी ने एक
भयानक गर्जना की, जिससे वह भस्मीभूत हो गया। इसके पश्चात् उन्होंने दैत्य की
सेना नष्ट कर दी। केवल कुछ भगोड़ों को छोड़ दिया जिससे कि वे उसे समाचार
दे सकें। शुंभ-निशुंभ आपे से बाहर हो गए और चण्ड-मुण्ड को पठाया। पर्वत
पर जाकर उन्होंने देखा कि एक स्त्री गधे पर बैठी अट्टहास कर रही है। उन्हें
देखकर वह कुपत हो गई और उनकी सेना के दस, बीस और तीस सैनिकों को
एक साथ उठा-उठा कर ऐसे खाने लगी जैसे कोई फल खाता है। उन्होंने फिर
मुंड को केशों से पकड़ा और उसका सिर काट कर अपने मुख के ऊपर लटका
कर उसका खून पी गई। चण्ड ने जब एक वीर की गति देखी तो वह देवी की
ओर बढ़ा, पर वह सिंह पर चढ़ गई और उस पर झपट पड़ी और उसका भी
वही हाल किया जो मुण्ड का किया था। उसके बहुत से सैनिकों को खा लिया
और घायलों का खून पी लिया।
महाबलियों ने जैसे ही यह चिंताजनक समाचार सुना, उन्होंने स्वयं जाने का संकल्प
किया और अपने सैनिकों को एकत्र करके असंख्य वीरों को लेकर हिमालय की