बारहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने देवताओं का मुकुट क्यों उतारा और देवियों की ताजपोशी की? - Page 117

102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ओर बढ़े। देवताओं ने इस विशाल सेना को आश्चर्यपूर्वक देखा और देवी महामाया

(दुर्गा) की सहायता के लिए आरोहित हुई, जिन्होंने शीघ्र ही शुंभ-निशुंंभ के

सेनानायक अपने शत्रु रक्तबीज को नष्ट कर दिया। उन्होंने देखा कि देवी ने उसकी

पूरी सेना का सफाया कर दिया। यद्यपि उन्होंने रक्तबीज के पूरे शरीर को छलनी

कर दिया किन्तु उसके रक्त की एक-एक बूंद से एक-एक सहस्त्र उतने ही

बलशाली रक्तबीज पैदा हो गए। इस प्रकार असंख्य शत्रुओं ने दुर्गा को घेर लिया।

देवों ने देखा कि देवी के लिए संकट उत्पन्न हो गया है। इस अवसर पर दुर्गा

के साथ लड़ रही काली से कहा कि यदि वह रक्तबीज के रक्त की बूंद धरती

पर गिरने से पहले ही पी जाएगी तो चण्डी उससे लड़कर उसकी चाल विफल

कर देगी। काली ने स्वीकार कर लिया। इस प्रकार सेनानायक सहित पूरी सेना

को मौत के घाट उतार दिया गया।

अब शुंभ-निशुंभ ने निराश होकर देवी को द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारा। पहले

शुंभ मैदान में आया। दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ। बाद में दोनों महाबलि

काल-कवलित हुए। काली ने जम कर रक्तपान किया। देवताओं और देव पत्नियों

ने देवी वीरांगना का जय-जयकार किया। देवी ने उन्हें आशीर्वाद दिया।’’

मार्कण्डेय पुराण में विभिन्न रूपों में दुर्गा के वीरोचित कार्यों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है। वह कहता हैः

‘‘दुर्गा के रूप में उन्होंने दैत्यों का संदेश ग्रहण किया, दस भुजा के रूप में

उन्होंने उनकी सेना का संहार किया, सिंहवाहिनी के रूप में रक्तबीज से लड़ी,

महिषासुर-मर्दनी के रूप में महिषासुर रूपी शुंभ का हनन कया। जगतधात्री

के रूप में उन्होंने दैत्यों की सेना का संहार किया। काली के रूप में रक्तबीज

का नाश किया। मुक्तकेशी के रूप में उन्होंने दैत्यों की दूसरी सेना को समाप्त

कर दिया। तारा बनकर शुंभ को उसके वास्तविक रूप में मौत के घाट उतारा,

छिन्नमस्तका के रूप में उन्होंने निशुंभ का वध कया, जगद-गौरी (स्वर्णवर्णा)

बनकर उन्होंने देवताओं का अभिवादन और आभार स्वीकार किया।’’

वैदिक तथा पौराणिक देवियों की तुलना में कुछ रोचक प्रश्न उभरते हैं। इनमें से एक स्वाभाविक है। वैदिक साहित्य में असुरों के साथ युद्ध के अनेक कारण हैं। ब्राह्मण साहित्य में भी उसकी आवृति है। परन्तु असुरों के साथ सभी युद्ध वैदिक देवों ने लड़े। वैदिक देवियां उनमें सम्मिलित नहीं हुई थीं।

पौराणिक देवियों के संबंध में स्थिति बिल्कुल भिन्न है। पौराणिक काल में भी वैदिक काल की भांति असुरों से युद्धों का विवरण है। भिन्नता यह है कि वैदिक