बारहवीं पहेली
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काल में असुरों से देवता लड़े, लेकिन पौराणिक काल में देवियां लड़ीं। ऐसा क्यों है? क्योंकि पौराणिक काल में वह कार्य देवियों को करना पड़ा, जो वैदिक काल में देवों ने किया? यह बात नहीं है कि पौराणिक काल में देवता विद्यमान नहीं थे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव मौजूद थे, जिनका पौराणिक काल में आधिपत्य रहा। जब वे असुरों से युद्ध के लिए मौजूद थे तो देवियां इस उद्देश्य से क्यों आगे आइंर्। इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता नहीं मिलता और इसका उत्तर चाहिए।
दूसरा प्रश्न यह है कि शक्ति का वह स्रोत क्या है जो पौराणिक देवियों में विद्यमान था और वैदिक देवियों में नहीं था? पौराणिकों का उत्तर है कि देवताओं की शक्ति ही देवियों में निहित थी। सामान्य सिद्धांत यह था कि प्रत्येक देव में शक्ति थी और वही शक्ति उनकी पत्नियों में विराजमान थी। यह सिद्धांत इतना प्रचलित हुआ कि देवियां शक्ति कहलाने लगीं और देवियों के उपासक शाक्त कहलाए।
इस सिद्धांत के संबंध में कुछ प्रश्न उठते हैंः-
पहला यह कि यद्यपि पुराणों में अनेक देवियों के नाम हैं। किन्तु उनकी संख्या वास्तव में पांच ही है। सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती, दुर्गा और काली। सरस्वती और लक्ष्मी, ब्रह्मा और विष्णु की पत्नियां हैं, जो शिव की भांति ही पौराणिक देवता हैं। पार्वती, दुर्गा और काली शिव की पत्नियां हैं। सरस्वती और लक्ष्मी ने किसी असुर का संहार नहीं किया और कोई वीरता नहीं दिखाई। प्रश्न है क्यों? ब्रह्मा और विष्णु में भी शक्ति थी फिर उस सिद्धांत के अनुसार उनकी पत्नियों में भी संनिहित होनी चाहिए थी। फिर सरस्वती और लक्ष्मी ने असुरों के विरुद्ध युद्ध क्यों नहीं किया? यह भूमिका केवल शिव पत्नियों के लिए ही थी। यहां भी पार्वती की भूमिका दुर्गा से भिन्न थी। पार्वती एक सामान्य नारी दिखाई गई है। दुर्गा की भांति वह भी शिव की शक्ति है। पार्वती में शिव की शक्ति इतनी शिथिल, साधारण और निष्क्रिय क्यों है?
दूसरा प्रश्न यह है क देवियों की स्वतंत्र रूप से पूजा आरंभ करने का यह औचित्य सही लगता है परन्तु तार्किक और ऐतहासिक दृष्टि से इसे स्वीकार करने में कठिनाई है। शुद्ध तार्किक दृष्टि से देखें तो यदि प्रत्येक देव में शक्ति है तो फिर वैदिक देवों में भी वह शक्ति होनी चाहिए थी। फिर वैदिक देवों की पत्नियों पर यह सिद्धांत लागू क्यों नहीं होता? यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो यह कहने का कोई औचित्य नहीं है कि पौराणिक देवों में भी यह शक्ति विद्यमान थी।
फिर ऐसा लगता है कि ब्राह्मणों ने यह नहीं सोचा कि उन्होंने मात्र दुर्गा को ही वीरांगना बताया है जिसने असुरों का संहार किया। इससे उनके अपने ही देवता दयनीय तथा पामर अथवा कायर सिद्ध होते हैं। ऐसा प्रकट होता है कि देवता असुरों