104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से अपनी रक्षा नहीं कर पाए और उन्हें अपनी पत्नियों का सहारा लेना पड़ा। इस संबंध में मार्कण्डेय पुराण का एक उदाहरण ही पर्याप्त है कि पौराणिक देव कितने दुर्बल थे, और ब्राह्मणों के अनुसार कैसी दुर्बलता उन्होंने असुरों के समक्ष दिखाई। मार्कण्डेय पुराण कहता हैः
‘‘दैत्यों के राजा महिष ने एक बार युद्ध में देवताओं को इतनी पटखनी खिलाई
कि वे धरती पर भिखारियों की तरह घूमते थे। पहले इन्द्र उन्हें ब्रह्मा के पास
ले गए फिर शिव के। क्योंकि ये दोनों देव कोई भी सहायता करने की स्थिति
में नहीं थे, वे विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु उनका संताप देखकर इतने दुखी हुए
कि उनके नेत्रों से एक प्रभा उत्पन्न हुईं, उसमें से एक नारी-रूप प्रकट हुआ,
जिसका नाम महामाया (दुर्गा का दूसरा नाम) था। अन्य देवताओं के मुखों से
भी आभा फूटी। वह भी महामाया में समा गई, इसका परिणाम यह निकला कि
वह आभा पुंज बन गई जैसे कि अग्नि का पर्वत हो। वह वायुमंडलन में उड़ गई
और दैत्यों को पछाड़ा तथा देवताओं की रक्षा की।’’
ऐसे कायर देवों में शक्ति कहां थी? जब उनमें शक्ति नहीं थी तो वे अपनी पत्नियों को कैसे दे सकते थे? यह कहना कि देवियों में शक्ति थी, मात्र एक पहेली ही नहीं है, वरन् एक विसंगति है। इसका उत्तर कोई नहीं दे पाता कि शक्ति के सिद्धांत का अनुसंधान क्यों किया गया? क्या ब्राह्मणों ने धर्म के नाम पर नये सिद्धांत को गढ़कर देवी-पूजा प्रारंभ नहीं की और देवताओं का अपमान नहीं किया?