तेरहवीं पहेली: अहिंसा की पहेली - Page 120

तेरहवीं पहेली

अहिंसा की पहेली

यदि हम प्राचीन आर्यों की आदतों और सामाजिक व्यवहारों की तुलना परवर्ती हिंदू समाज से करते हैं तो परिवर्तनों के संदर्भ में हम आश्चर्यजनक सामाजिक क्रांति पाएंगे।

क्या आर्य एक जुआरी प्रजाति के थे। आर्य सभ्यता के प्रारंभकाल में जुआ एक विज्ञान के रूप में विकसित हो चुका था यहां तक कि कई तकनीकी शब्द भी गढ़े गए। हिंदू चार युगों को कृत, त्रेता, द्वापर और कलि के नाम से जानते हैं, जिनके अनुसार इतिहास का काल-विभाजन किया गया था। दरअसल, ये आर्यों द्वारा जुए में

खेले जाने वाले दाव थे। सबसे सौभाग्यशाली दाव कृत कहलाता था और दुर्भाग्यपूर्ण दाव को कलि कहते थे। त्रेता और द्वापर इनके बीच के थे। यही बात नहीं थी कि प्राचीन आर्यों में द्यूतक्रीड़ा भली-भांति विकसित थी अपितु बाजियां भी ऊंची-ऊंची हुआ करती थीं। बड़ी-बड़ी धनराशि की बाजियां भी हुआ करती थीं। ऐसी बड़ी-बड़ी बाजियां तो अन्यत्र भी थीं परन्तु आर्यों से बढ़कर नहीं थीं। आर्य जुए में अपने राज्य, यहां तक कि पत्नियां भी दाव पर लगा दिया करते थे। राजा नल अपना राज्य ही हार बैठे थे। पांडव इससे भी बढ़कर थे। उन्होंने न केवल अपना राज्य बल्कि अपनी पत्नी द्रौपदी तक दाव पर लगा दी और दोनों को हार गए। केवल धनवान आर्य ही जुआ नहीं खेलते थे बल्कि यह बहुतों का व्यसन था। प्राचीन आर्यों में द्यूत क्रीड़ा इतनी व्याप्त थी कि धर्मसूत्रों (शास्त्रों) के लेखकों को राजाओं को सलाह देनी पड़ती थी कि कठोर नियम बनाकर उस पर नियंत्रण की सख्त जरूरत है।

पहेली नं. 13 की मूल विषयवस्तु में ‘‘गोवध कर्ता ब्राह्मण गोपूजक कैसे बने’’ दिया गया था। यह अध्याय इन पृष्ठों में प्राप्त नहीं है। हां, कुछ पृष्ठ ‘‘अहिंसा की पहेली’’ शीर्षक से प्राप्त हुए हैं। यहां इसे सम्मिलित कर लिया गया है जिसका विषय भी वही है। अंग्रेजी में इसके टाइप किए हुए दस पृष्ठ मिले थे, जो निःसंदेह अपूर्ण विषयसामग्री है। - संपादक