तेरहवीं पहेली: अहिंसा की पहेली - Page 121

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आर्यों में मैथुन के संबंध में स्वच्छन्दता विद्यमान थी। एक समय था, जब वे विवाह को स्त्री-पुरुष के बीच स्थायी संबंध नहीं मानते थे। यह महाभारत से स्पष्ट है, जहां पाण्डुपत्नी कुंती पाण्डु के यह कहने पर कि वह किसी अन्य से पुत्र प्राप्त करे, वह बताती है कि उसको पहले ही एक पुत्र की प्राप्ति हो चुकी है। ऐसे भी उदाहरण हैं कि बहन-भाई, मां-बेटे, पिता-पुत्री और नाना, दादा-पौत्रियों तथा नातिनों के बीच शारीरिक संबंध थे। स्त्रियों में स्वछंदता थी। यह खुली स्वच्छंदता थी जहां कई पुरुष एक स्त्री को भोगते थे और उस पर किसी का निजी अधिकार नहीं था। ऐसी स्त्रियां गणिकाएं कहलाती थीं। आर्यों की स्त्रियों में स्वच्छंद मान्यता और भी थी। इसके अनुसार एक स्त्री कई पुरुषों से बंधी होती थी और प्रत्येक का दिन निध ार्रित होता था। वह स्त्री वारांगना कहलाती थी। वेश्यावृत्ति फली-फूली हुई थी और सार्वजनिक मैथुन का प्रचलन था। परन्तु यह प्रथा प्राचीन आर्यों में थी। प्राचीन आर्यों में पशुगमन (मैथुन) भी प्रचलित था और ऐसे महारथियों में अधिकांशतः कुछ सम्मानित ऋषि थे।

प्राचीन आर्य मद्यसेवी भी थे। मदिरा उनके धार्मिक कृत्यों का अनिवार्य अंग थी। वैदिक देवता मदिरा पीते थे, दैवी मदिरा सोम कहलाती थी। क्योंकि आर्यों के देवता ही मद्यपान करते थे, इसलिए आर्यों को मदिरापान में कोई नैतिक संकोच की बात नजर नहीं आती थी। दरअसल शराब पीना आर्यों का धार्मिक कर्तव्य था। आर्यों में इतने सोम-यज्ञ होते थे कि कोई बिरला दिन ही मद्यपान से बचता होगा। सोम-यज्ञ केवल तीन उच्च वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों तक सीमित था। इसका अर्थ यह नहीं कि शूद्र मदिरापान से मुक्त थे। उनके लिए सोमपान निषिद्ध था, वे सुरा पीते थे जो घटिया पेय था। घटिया शराब बाजार में मिलती थी। केवल आर्य पुरुषों को ही शराब की लत नहीं थी बल्कि उनकी स्त्रियों को भी यह लत थी। कौषीतिक गृह्यसूत्र 1. 11-12 में परामर्श दिया गया है कि चार अथवा आठ ऐसी स्त्रियां जो विधवा न हों, भोजन के साथ मदिरापान कर, विवाह-संस्कार की पूर्व रात्रि में नृत्य के लिए बुलाई जाएं। नशीली शराब पीने की प्रवृत्ति केवल गैर-ब्राह्मण स्त्रियों तक सीमित नहीं थी। ब्राह्मण स्त्रियों में भी उसकी आदतें थीं। मदिरापान कोई पाप नहीं, व्यसन था। यह एक सम्मानजनक प्रथा थी। ऋग्वेद कहता हैः

‘‘मदिरापान से पूर्व सूर्योपासना’’ की जाए।

यजुर्वेद कहता हैः

‘‘हे देव सोम! सुरा से सुदृढ़ और शक्तिमान होकर अपनी शुद्ध आत्मा से देवों को प्रसन्न कर, यज्ञकर्ताओं को अमृत पेय दे और ब्राह्मण तथा क्षत्रियों को शक्ति।’’