तेरहवीं पहेली
मत्र ब्राह्मण में कहा गया है किः
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‘‘जिससे स्त्रियां पुरुषों को आनन्दित करें और जिससे जल मदिरा में परिर्णित हो जाए’’ (पुरुषों के आनन्द हेतु), आदि।
रामायण के उत्तरकाण्ड में स्वीकार किया गया है कि राम और सीता दोनों ने मदिरापान कया। उसमें कहा गया हैः
जैसे कि इन्द्र ने अपनी पत्नी शचि को मदिरापान करते देखा, वैसे ही रामचन्द्र
ने देखा कि सीता ने परिष्कृत मधु, जो मदिरा कहलाता था, पिया। सेवकगण
रामचन्द्र के लिए मांस और मीठे फल लाए।
वैसा ही प्रसंग महाभारत के ‘उद्योग पर्व’ में कृष्ण और अर्जुन के संबंध में आया हैः
‘‘अर्जुन और कृष्ण मधु से निर्मित मादक मदिरा पी रहे थे और गले में हार डाल
रखे थे। बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण धारे हुए थे। सोने के रत्नजडि़त आसन पर बैठे
थे। मैंने देखा श्रीकृष्ण के पांव अर्जुन की गोद में हैं और अर्जुन के पांव द्रौपदी
और सत्यभामा की गोद में हैं।’’
सबसे बड़ा परिवर्तन भोजन में आया। आजकल हिंदू आहार के बारे में बहुत विचारशील हैं। आमतौर पर दो प्रकार की सहभोज ग्रहण की सीमाएं हैं। हिंदू किसी गैर हिंदू का पकाया भोजन नहीं करता। हिंदू किसी व्यक्ति के हाथ का भोजन नहीं करता जब तक कि वह ब्राह्मण अथवा उसी की जाति का न हो। हिंदू केवल यही नहीं देखता कि वह किसका बना खाना खाए, वह इसका भी ध्यान रखता है कि वह क्या खाए? आहार की दृष्टि से हिन्दुओं की दो श्रेणियां हैंः
- शाकाहारी, और 2. मांसाहारी
मांसाहारियों की भी कई उपश्रेणियां हैंः
वे जो सभी मांस और मछली खाते हैं।
वे जो मात्र मछली खाते हैं।
जो मांस खाते हैं, उनकी भी कई उपश्रेणियां हैंः
वे जो गाय को छोड़कर किसी भी पशु-पक्षी का मांस खाते हैं।
वे जो गाय सहित सभी प्रकार का मांस खाते हैं।
वे जो मांस खाते हैं, परन्तु गाय का नहीं (मुर्दा या जिन्दा) मुर्गे का भी