तेरहवीं पहेली: अहिंसा की पहेली - Page 123

108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं। आहार की दृष्टि से हिन्दुओं में से ब्राह्मणों के दो वर्ग हैंः 1. पंच-गौड़, और 2. पंच-द्रविड़।

इनमें से पंच द्रविड़ पूर्ण शाकाहारी हैं। हिंदुओं का अन्य वर्ग अर्थात् अछूत मांसाहारी हैं। वे केवल बकरी और पक्षियों का मांस ही नहीं खाते बल्कि गाय भी खाते हैं, चाहे वह जिंदा हो या मुर्दा। मध्यमार्गी गैर ब्राह्मणों की अलग आदतें हैं। उनमें कुछ ब्राह्मणों की तरह शाकाहारी हैं। शेष ब्राह्मणों के विपरीत मांसाहारी हैं। उनमें से कोई भी गाय का मांस नहीं खाता।

एक अन्य तथ्य की ओर ध्यान देना है। वह है भक्षण के लिए पशु-वध करना। कोई हिंदू पशु-वध नहीं करेगा। यहां तक कि खाने के लिए भी, सिवाय एक छोटी सी जाति खटीक के। हिंदुओं में कोई कसाई नहीं होता। यहां तक कि अछूत भी वध नहीं करते। वह मुर्दा गाय का मांस खाते हैं, परन्तु वह गाय का वध नहीं करते। आजकल भारत में कसाई मुसलमान हैं। कोई हिंदू, जो खाने के लिए मांस चाहता है, वह मुसलमान को बुलाता है। प्रत्येक हिंदू अहिंसा में विश्वास रखता है।

भारत में शाकाहारी प्रथा कब से प्रचलित है? अहिंसा के प्रति आस्था कब जन्मी? बहुत से हिंदू इस प्रश्न को टाल जाते हैं। वे कहते हैं कि शाकाहार और अहिंसा भारत के लिए कोई नवीन बात नहीं है।

इस विवाद पर जो साक्ष्य उपलब्ध हैं, उनसे पता चलता है कि वर्तमान हिंदुओं के पूर्वज प्राचीन आर्य न केवल मांसाहारी थे बल्कि वे गोमांस भी खाते थे। निम्नांकित साक्ष्य इस संबंध में पर्याप्त हैं।

वह निर्विवाद है।

मधुपर्क का उदाहरण लें।

प्राचीन आर्यों में अतिथि सत्कार के लिए एक सुविदित प्रचलन था, जो मधुपर्क के नाम से जाना जाता था। उसका विस्तृत विवरण विभिन्न गृह्यसूत्रों में उपलब्ध है। अधिकांश गृह्य सूत्रों में 6 व्यक्ति मधुपर्क के पात्र बताए गए हैं। उनके नाम हैः

  1. ऋत्विज अथवा यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण, 2. आचार्य, 3. वर, 4. राजा, 5. स्नातक और 6. यजमान का प्रिय कोई अन्य व्यक्ति। इस सूची में कुछ लोग अतिथि को जोड़ते हैं। इसके अतिरिक्त ऋत्विज, राजा और आचार्य को छोड़कर अन्य को वर्ष में एक बार ही मधुपर्क दिया जाए। ऋत्विज, राजा और आचार्य जब भी आएं, उन्हें तभी मधुपर्क दिया जाए। इसकी रीति यह है कि पहले अतिथि के पांव धुलाए जाते हैं, फिर कुछ मंत्रों के उच्चारण के पश्चात् वह पिया जाता है।