तेरहवीं पहेली
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मधुपर्क में क्या-क्या होता है? मधुपर्क का शाब्दिक अर्थ है ऐसा संस्कार जब किसी व्यक्ति के आचमन में मधु उडेला जाता है। आरम्भ में यही मधुपर्क था। किन्तु कालांतर में इसकी सामग्री बढ़ती गई, जिसमें मधु में काफी कुछ मिलाया जाने लगा। आरम्भ में इसमें दही, शहद और मक्खन होता था। फिर इसमें पांच पदार्थ सम्मिलित हुए- दही, मधु, घी, यव और जौ। फिर इसमें नौ पदार्थ होने लगे। कौशिक सूत्र में नौ मिश्रण पदार्थ हैं। ब्रह्म (दही और मधु), ऐन्द्र (पायस), सौम्य (दही और घी), मौसल (सायने और घी), (इसका उपयोग केवल सौत्रमणि और राजसूय यज्ञ में होता था) वरुण (पानी और घी), श्रवण (शीशम का तेल और घी), परिव्राजक (शीशम का तेल और खली)। अब हम मानव गृह्य-सूत्र पर आते हैं। वह कहता है कि वेद घोषित करते हैं कि मधुपर्क बिना मांस के नहीं बनता। इसलिए विधान है कि यदि गाय नहीं तो बकरे का मांस अथवा पायस (दूध ये बना चावल) दिया जाए। हि. ग्र. 1,13-14 के अनुसार अन्य मांस प्रस्तुत किया जाना चाहिए। बौ.गृ. (1.2.51-54) कहता है कि गाय नहीं तो बकरी या भेड़ का मांस दिया जाना चाहिए या वन्य जंतु का मांस (हिरन आदि का) भी दिया जा सकता है क्योंकि बिना मांस के मधुपर्क नहीं बन सकता अथवा कोई मांस देने में सक्षम न हो तो वह कंदमूल पकाएं। परन्तु अंत में केवल मांस ही मधुपर्क का आवश्यक भाग बन गया। दरअसल कुछ गृह्य-सूत्रों ने प्रबल रूप से कहा है कि बिना मांस के मधुपर्क नहीं बन सकता। उनका आधार ऋग्वेद (8,101.5) है जो कहता है - ‘‘मधुपर्क बिना मांस के न हो।’’
इस प्रकार मांस-भक्षण सामान्य था। ब्राह्मण से शूद्र तक सभी मांसाहारी थे। धर्म सूत्रों में जंगली जंतुओं, पक्षियों, एवं मछली के मांस के बारे में अनेक नियम हैं। गौतम 17.27-31, आप.ध.सू. 1.5.17.35, वा. धर्मसूत्र 14.39-40, यजु. 1.177, विष्णु ध.सू. 51.6, सांख्य (अपरार्क पृ, 1167), रामायण (किष्किंधा 17.39) मार्कण्डेय पुराण (35.2-4) में कहा गया है कि साही को छोड़ पांच पंजे वाले सभी जीवों का, ऊपर-नीचे के जबड़े वाले जीवों, झबरे और चिकनी त्वचा वाले जीवों (जैसे सांप) मुर्गों, जंगली सुअर, गाय और बैल का मांस अभक्ष्य है। आप. ध.सू. 1.5.17.29-31 के अनुसार एक खुरवाले ऊंट और गव्य (गयाल), सुअर, सरभ और गाय का मांस न खाएं, परन्तु (दुधारू) पशुओं और बैल का मांस भक्ष्य है क्योंकि वाजसनेयक का कथन है कि इनका मांस शुद्ध होता है। आ.ध.सू. (11.2.5.15) के अनुसार वेद शिक्षकों के लिए मांस-भक्षण का निषेध है।
(अपूर्ण। शेष अंश अप्राप्य)