चौदहीं पहेली
अंगूर से बनी (द्राक्षा),
खजूर से बनी (खरजूरी),
सामान्य ताड़ी से बनी (ताड़ी),
नारियल से बनी (नारिकेल),
ईख से बनी (इक्षु),
माधविका के पौधे से बनी मदिरा,
पीपल से बनी (सैरा),
बेर से बनी (आरिष्ट),
शहद से बनी (मधुका),
शीरे से तैयार रम के समान (गौडी या मैरेय),
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- अरक, चावल और अन्य अनाज से बनी मदिरा जो सुरा, वारुणी या पैश्ती के नाम से जानी जाती है।
उपरोक्त मादक द्रव्यों के साथ-साथ जिनका बार-बार जिक्र आया है, वे है तन्का सेब से निर्मित, कोली और कादम्बरी, इनमें अंतिम मदिरा बलरामजी को अति प्रिय थी।
मांस पक्षियों, जंतुओं अथवा मछली का हो सकता है। मादक द्रव्यों का आनन्द लेने के लिए भुना अन्न खाया जाता है। प्रत्येक मद्य के अपने गुण और लाभ बताए गए हैं। उन्हीं के अनुसार उसका पान किया जाता है। इस प्रकार एक मदिरा से मोक्ष मिलता है, एक से ज्ञान, दूसरी से शक्ति, एक से सम्पदा, एक शत्रुनाशी, दूसरी रोगहारी, एक पापनाशी है और एक आत्मा को शुद्ध करती है।’’
तांत्रिक पूजा बंगाल के आतरिक भागों में पहुंच गई। अपने अनुभवों के आधार पर राजेन्द्र लाल मित्र कहते हैंः ख्1,
‘‘मैं कलकत्ता के एक उच्च संभ्रांत परिवार से संबद्ध एक अति सम्मानित
महिला को जानता था, जो कौल सम्प्रदाय से संबंधित थी और पिछहत्तर साल
तक जीवित रही। ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसे अपनी प्रार्थना (वह प्रतिदिन
सुबह-शाम करती थी) कभी अपनी जीभ में सींक से अरक छुआए बिना और
भगवान की पूजा फूलों पर शराब छिड़के बिना की हो। मुझे इस बात में संदेह
है कि उसने अपने जीवन-काल में कुल मिलाकर एक गिलास अरक पिया हो
- राजेन्द्रलाल मित्र, इण्डो-आर्यन्स, पृ. 405-6