तेरहवीं पहेली 113
के समान है जिसे चाहे भोगे किंतु तंत्र एक कुलीन नारी है जो एक ही से बंधी है। ब्राह्मणों ने तंत्र का कभी खण्डन नहीं किया बल्कि उन्होंने इसे पंचम वेद माना। मनुस्मृति के विख्यात भाष्यकार सनातनी ब्राह्मण कुल्लूक भट्ट ने कहा कि श्रुतियां दो हैं, वैदिक और तांत्रिक।
ब्राह्मणों ने न केवल तंत्रों का खण्डन किया बल्कि वास्तव में तंत्र-पूजा को प्रोत्साहित किया। मातृका भेद तंत्र में शिव अपनी भार्या पार्वती को ऐसे कहते हैंः ख्1,
‘हे मृदुभाषी देवी! ब्राह्मणों को मदिरा पीने से मोक्ष प्राप्त होता है। मैं तुम्हें एक
महान सत्य बताता हूं। हे पर्वत-पुत्री! जब मैं कहता हूं, कि जो ब्राह्मण मदिरा
पान और उसके संसर्ग में लिप्त होता है तो वह स्वयं शिव हो जाता है। बल्कि
जैसे जल-जल में मिल जाता है, धातु-धातु में घुल जाती है, जैसे एक घड़े का
सीमित आकार एक बड़े आकार के पात्र में विलीन हो जाता है और वायु-वायु
में समा जाती है, इस प्रकार ब्राह्मण विश्वात्मा ब्रह्म से एकाकार हो जाता है।’
‘इस संबंध में रंचमात्र संदेह नहीं कि दिव्यता की आशा और परम सुख के अन्य
रूप क्षत्रियों तथा अन्यों के लिए हैं, किन्तु सच्चा ज्ञान मादक द्रव्य के बिना
कदापि प्राप्त नहीं किया जा सकता। तो क्या ब्राह्मण को सदैव इसका सेवन करना
चाहिए? वेदों की जननी गायत्री को रट-रट कर कोई पंडित नहीं बन सकता।
पंडित तभी बनता है जब उसे ब्रह्म-ज्ञान हो। देवताओं के लिए ब्रह्म ही अमृत है
और धरा पर यह अरक है (चावल से बनी शराब) क्योंकि इसी के माध्यम से
देवत्व (सुरत्व) की स्थिति प्राप्त होती है। इसलिए यह सुरा कहलाती है।
ब्राह्मणों ने पितामह मनु को क्यों नकार दिया और दुबारा मांस-मदिरा का सेवन क्यों आरम्भ कर दिया जिसे मनु ने बंद कर दिया था, यह एक पहेली है।
- इण्डो-आर्यन्स में राजेन्द्रलाल मित्र द्वारा उद्धृत।