पन्द्रहवीं पहेली
ब्राह्मणों ने अहिंसक देवता के साथ रक्त-पिपासु देवी का
विवाह क्यों किया?
जब ब्राह्मणों ने मांस-मदिरा का सेवन आरम्भ कर दिया तो उन्हें पुराणों में पशुबलि की वकालत करने में कोई संकोच नहीं हुआ। एक पुराण का विशेष उल्लेख करना आवश्यक है। वह है काली पुराण । यह पुराण स्पष्ट रूप से देवी काली की पूजा को प्रचारित करने के लिए लिखा गया था। इस पुराण में एक अध्याय का नाम ही ‘रुधिर अध्याय’ है।
मैं रुधिर अध्याय का सारांश देता हूं। इस अध्याय ख्1, में शिव ने तीन पुत्रों बेताल, भैरव और भैरों को निम्न प्रकार से सम्बोधित किया हैः
‘मेरे पुत्रों! देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए सम्पादित होने वाले संस्कार और नियमों के विषय में, मैं तुम्हें बताता हूं।’
‘वैष्णवी तंत्र में जो प्रावधान किया गया है, उनका सभी अवसरों पर सभी देवताओं को बलि चढ़ाकर पालन किया जाए।’
‘पक्षी, कच्छप, घडि़याल, मीन, वन्य जंतुओं की नौ प्रजातियां, भैंसा, वृषभ, बकरा, नेवला, जंगली-सुअर, दरियाई घोड़ा, मृग, बारहसिंगा, सिंह, बाघ, मनुष्य और बलिदाता का स्वयं का रक्त चण्डिका देवी और भैरों की पूजा के उचित पदार्थ हैं।’
‘बलि चढ़ाने से ही राजाओं को सुख, स्वर्ग और शत्रु विजय प्राप्त होती है।’
‘देवी, मछली और कच्छप के चढ़ाने से एक माह की अवधि के लिए खुश रहती
- इस अध्याय का डब्लू.सी. ब्लैकियर ने अंग्रेजी में अनुवाद किया था, जो एशियाटिक अनुसंधानों में प्राप्य है।
यह अंग्रेजी में सोलह पृष्ठों की लेखक द्वारा संशोधित सामग्री प्राप्त हुई है जो पूर्ण प्रतीत होती है। - संपादक