पन्द्रहवीं पहेली
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है और मगरमच्छ से तीन मास तक, वन्य जंतुओं की नौ प्रजातियों से देवी नौ महीने प्रसन्न रहती है और इस अवधि में यह भक्त का कल्याण करती है। गौर, नीलगाय के रक्त से एक वर्ष और मृग तथा जंगली सुअर से बारह वर्ष तक संतुष्ट रहती है। सरभ का रक्त देवी को पच्चीस वर्ष तक संतुष्ट रखता है, भैंस तथा दरयाई घोड़े का रक्त एक सौ वर्ष और बाघ का भी इतने ही वर्ष संतुष्ट रखता है। सिंह और बारहसिंगा और मानव-जाति का रक्त एक हजार वर्ष तक प्रसन्न रखता है। इनके मांस से भी उतनी ही अवधि तक संतुष्टि होती है, जितने दिन इनके रक्त से। अब दरियाई घोड़े और मृग के मांस तथा रोहू मछली के चढ़ावे का फल सुनो।’
‘‘मृग और दरियाई घोड़े के मांस से देवी पांच सौ वर्ष तक और रोहू मछली तथा बारहसिंगे से मेरी प्रिया (काली) तीन सौ वर्ष तक संतुष्ट रहती है।’’
‘आठोंं पहर में दो बार पानी पीने वाली रेवड़ की प्रमुख कृशकाय बच्चों वाली इकरंगी बकरी बधिनासा कहलाती है। वह सर्वोत्तम हव्य और कव्य हैं।’
‘‘नीली ग्रीवा, लालशीर्ष, श्याम टांगों और श्वेत पंखों वाला पक्षी भी वर्धुनासा कहलाता है। वह पक्षीराज है और मेरा तथा विष्णु का प्रिय है।’’
‘निम्नांकित विधि से दी गई मानव-बलि से देवी एक हजार वर्ष तक प्रसन्न रहती है और तीन मनुष्यों की बलि से एक लाख वर्ष तक। मेरे रूपधारी कामाख्या, चण्डिका और भैरव मनुष्य के मांस से एक हजार वर्ष के लिए संतुष्ट हो जाते हैं। रक्त का अर्घ्य पवित्र मंत्रों में अमृत बन जाता है, कामाख्या को शीश अर्पित किया जाए तो वह अति प्रसन्न होती है। जब ज्ञानी देवी को चढ़ावा चढ़ाऐं तो रक्त और शीश अर्पित करें और जब अग्नि को आहूति दें तो मांस डालें।’
‘भक्त इस बात से सचेत रहें कि अशुद्ध मांस अर्पित न किया जाए क्योंकि वे स्वयं शीश और रक्त को अमृत मानते हैं।’
‘बेल पर लगने वाला फल, गन्ना, नशीली मदिरा, सड़ाई हुई मदिरा भी अन्य आहुतियों के समान माने जाते हैं और देवी को उतने काल तक प्रसन्न रखते हैं जैसे कि बकरी की बलि से।’
‘बलि के लिए चन्द्रहास सर्वोत्तम हथियार है, छुरे का स्थान दूसरा है जबकि कुदाली एक निकृष्ट साधन है।’
‘इन शास्त्रों के सिवाय बलि के लिए बरछी अथवा बाण का प्रयोग न किया जाए क्योंकि उस बलि को देवी स्वीकार नहीं करती और बलिदाता का मरण हो जाता है, जो अपने हाथों बलि के पशु अथवा पक्षी का शीश मरोड़ देता है, वह भी उतना ही