पन्द्रहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने अहिंसक देवता के साथ रक्त-पिपासु देवी का विवाह क्यों किया? - Page 131

116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पापी है, जितना ब्रह्म-हत्यारा, उसे भारी दुःख झेलने पड़ते हैं।

ज्ञानी को इस उद्देश्य से बनी कुल्हाड़ी को मंत्रों से पवित्र करके प्रयोग करना चाहिए जैसा कि दुर्गा और कामाख्या के विषय में विशेष रूप से उल्लेख है।

‘काली का नाम दो बार लिया जाए फिर कहा जाए ‘देवी ब्रजेश्वरी लाव्हा दंदयी नमः’ ये शब्द इस प्रकार उच्चारे जायं ‘‘जय! काली! काली जय! देवी! दामिनी देवी लौह खड्गधारी....’’ फिर वह कुल्हाड़ी अपने हाा में ले और निम्नांकित काल-रात्र्य मंत्र से फिर अग्नि चेतन करें।

‘बलिदाता कहेः हरंग-हिरंग, काली, काली’ भयंकर दांतों वाली देवी, खा, काट, अनिष्ट हर, कुल्हाड़ी से काट, झुक झपट, रक्त पी, उठा उठा। इस प्रकार काली वंदना काल-रात्र्य मंत्र कहलाती है।

‘इस मंत्र से किया गया वार काल-रात्र्य कहलाता है। काल-रात्रि (अंधकार की देवी) स्वयं बलिदाता के शत्रु का संहार करती हैं।’

‘बलिदाता को पूर्व निर्देशानुसार बलि देनी चाहिए और बलि-पशु से निम्न प्रकार कहें।’

‘प्राणी कर्त्ता की सृष्टि है, वह आत्म-बलिदान करे। इसलिए मैं तेरा जीवन लेकर बिना पाप किए तेरा बलिदान कर रहा हूं।’

‘बलिदाता उस देवता का नाम ले, जिसके लिए बलि दी जा रही हो। वह प्रयोजन बताए, जिसके लिए बलि दी जा रही है और उपरोक्त मंत्र के साथ बलि चढ़ा दे। उसका मुख उत्तर को हो चाहे पहले किसी अन्य दिशा में भी हो, बलिदाता अपना मुख उत्तर में रखे और बलिपात्र को पूर्व दिशा में रखें’ बलि चढ़ाने के बाद उसमें ‘नमक जरूर मिलाया जाए और पूर्वोक्त के अनुसार रक्त भी’।

‘जिस पात्र में रक्त अर्पित किया जाए, वह भक्त की परिस्थिति के अनुकूल हो सकता है। सोने का, चांदी का, तांबे का, पीतल का, दोना अथवा मृदापात्र, बलि में प्रयुक्त होने वाले काष्ठ भी मान्य हैं।’

‘वह लौह-पात्र अथवा पशुओं की खाल या वृक्ष-छाल, जस्ता या शीशे के बर्तन में भेंट न किया जाए, श्रब और श्रच अथवा भूमि पर भेंट न चढ़ाई जाए। घट का प्रयोग भी निषिद्ध है। रक्त धरती पर न उडेला जाए, वह पात्र उपयोग में लाया जाए, जिसका प्रयोग अन्य अवसरों पर देवताओं को भोग लगाने के लिए किया जाता है। जो व्यक्ति सम्पदा चाहता है, वह इन पात्रों का उपयोग करें। मानव-रक्त केवल धातु अथवा मिट्टी के बर्तन में चढ़ाया जाए। पात्रों के द्रोण अथवा वैसे ही पात्रों में न चढ़ाया जाए।’