पन्द्रहवीं पहेली
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‘‘अश्वमेध यज्ञ को छोड़कर अश्व की बलि देना अनुचित है। गजमेध के अतिरिक्त हाथी की बलि भी अनुचित है। राजा यह देखें कि इन अवसरों को छोड़कर यह बलियां न दी जाएं। किसी भी दशा में ये देवियों को न चढ़ाए जाएं। अवसर पड़ने पर अश्व के स्थान पर जंगली सांड चढ़ाया जा सकता है।’’
‘‘ब्राह्मण देवी को कभी सिंह अथवा बाघ या अपने रक्त की बलि न दें, न ही नशीली शराब चढ़ाएं। यदि कोई ब्राह्मण सिंह, बाघ अथवा मानव की बलि चढ़ाता है तो वह नरक जाएगा और जितने समय धरती पर रहेगा, दुःख दारिद्र भोगेगा।’
‘यदि कोई ब्राह्मण अपना रक्त अर्पित करता है तो वह ब्रह्म-हत्या के समान है और यदि वह मादक मदिरा चढ़ाता है तो वह ब्राह्मण नहीं रहता।’
‘कोई शास्त्री मृग न चढ़ाए_ यदि वह चढ़ाता है तो ब्रह्म-हत्या का भागी होता है। जहां कहीं सिंह, बाघ और मानव-बलि की आवश्यकता हो तो तीन कार्य किए जाएं। सिंह, बाघ और मानव की मक्की या जौ के गीले आटे की आकृतियां बना ली जाएं, उनकी बली इसी प्रकार चढ़ाई जाए जैसे जीवित प्राणियों की चढ़ाई जाती है। कुल्हाड़ी मंत्रोचार के साथ चलाई जाए।’
यदि कई पशुओं की बलि देनी हो तो केवल दो अथवा तीन को ही देवी के समक्ष लाना पर्याप्त है जो सभी की उपस्थिति मानी जाएगी। हे भैरव! मैंने तुम्हें उत्सव की सामान्य बातें बता दी हैं और यह भी बता दिया है कि बलि कैसे हो और किन अवसरों पर कौन से मंत्र पढ़े जाएं।
जब देवी भैरवी, या भैरव को भैंस की भेंट चढ़ाई जाए तो बलिपशु के समक्ष निम्नांकित मंत्र पढ़ा जाएः
‘हे भैंस, जिस रीति से तू घोड़े का नाश करती है, जिस रीति से तू चंडिका तक जाती है, तू मेरे शत्रु का उसी प्रकार विनाश कर और मुझे समृद्ध बना।’
‘‘हे मृत्यु के युद्धाश्व! श्रेष्ठ और अविनाशी स्वरूप, मुझे चिरायु कर और विख्यात कर। हे भैंस, तुझे नमन!
‘‘अब मानव-रक्त की भेंट चढ़ाने संबंधी विवरण सुनो।
‘‘मानव की बलि पवित्र पूजा-स्थल पर अथवा श्मशान में दी जाए। पूजा उपरोक्तानुसार श्मशान क्षेत्र में या कामाख्या मंदिर अथवा पहाड़ी पर की जाए। अब उसकी विधि सुनो।
‘‘श्मशान मेरा रूप है और यह भैरव कहलाता है। इसमें एक दिशा होती है,