118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जो तंत्र-स्थल कहलाती है। पूजा इन दो दिशाओं में होती है। तीसरे को हरूका कहते हैं।
मनुष्य की बलि पूर्वी दिशा में दी जाए जो भैरव के लिए पवित्र है। शीश दक्षिणी दिशा में चढ़ाया जाए, जो कपाल भूमि कहलाती है और भैरवी के लिए पवित्र है। रक्त पश्चिमी दिशा में अर्पित किया जाए जिस पर हरूका प्रभुत्व होता है।
सम्पूर्ण पूजा-विधि और पवित्र स्थान पर किसी व्यक्ति की बलि चढ़ाते समय, बलि चढ़ाने वाले द्वारा इस बात का ध्यान रखा जाए कि वह बलि-पशु पर नजर गड़ा कर न देखें।
अन्य अवसर पर भी बलि चढ़ाने वाला बलि-पशु पर दृष्टि न गड़ाए बल्कि सिर निगाह हटाकर चढ़ाया जाए।
‘‘बलि-प्राणी देखने में अच्छा हो, पूजा के साथ उसे तैयार किया जाए। वांछित विधियां सम्पन्न की जाएं, जैसे एक दिन पूर्व मांस रहित पवित्र भोजन कराकर और उसकी पूजा करके उसे पुष्पहार पहनाया जाए और चंदन से सुगंधित किया जाए।
‘‘फिर उसका मुख उत्तर की ओर रखें, बलि-पशु के विभिन्न स्वामी देवों की पूजा की जाए। फिर नाम पुकार कर बलि-पशु की पूजा की जाए।
‘‘इस प्रकार बलिदाता बलिपात्र की पूजा करें, वे मंत्र उच्चारे जो इस अवसर के लिए उपयुक्त हैं और जिनका पूर्व उल्लेख किया जा चुका है।
‘‘किसी चौपाए पशु अथवा मादा पक्षी की या किसी स्त्री की बलि न चढ़ाएं, इस प्रकार बलिदाता नरक में जाता है। यदि पशु-पक्षी पर्याप्त संख्या में हैं तो मादा की बलि दी जा सकती है, किन्तु मनुष्यों के संबंध में क्षम्य नहीं।
‘‘किसी ब्राह्मण अथवा चाण्डाल की बलि न दी जाए, न राजकुमारों की संतान की ही और न युद्ध में विजेताओं की, न ब्राह्मण और क्षत्रिय की संतान की, न संतानहीन भ्राता, न पिता की, न विद्वान की और न ही किसी अनिच्छुक व्यक्ति की। जो ऊपर गिनाए जा चुके हैं, उनके अतिरिक्त अज्ञात नाम के पशु-पक्षियों की बलि भी अनुकूल है। यदि उपरोक्त में कोई उपलब्ध नहीं है तो उनके स्थान पर गधे अथवा ऊंट की बलि दी जा सकती है। यदि अन्य पशु उपलब्ध है तो बाघ, ऊंट और गधे की बलि से परहेज किया जाए।
‘‘जब बलिपात्र की पूजा कर ली जाए, चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो अथवा पक्षी, तो पूर्वोक्त के अनुसार बलिदाता निर्धारित मंत्र का पाठ करें और देवता का आह्नान करते हुए बलि चढ़ा दें।