पन्द्रहवीं पहेली
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‘‘मनुष्य का सिर देवी के दक्षिण में रखा जाए और बलिदाता देवी के सम्मुख
खड़े होकर उनका आह्नान करें। पक्षी का रक्त बायीं और चढ़ाया जाए और पूजा करने वाले व्यक्ति के अंगों का रक्त सामने चढ़ाया जाए। मांसाहारी पशु अथवा पक्षियों के सिर से निकलने वाले रक्त रूपी अमृत, जल-जीवों के रक्त को बाएं हाथ से अर्पित करें।
मृग कच्छप दरियाई घोड़े और शशक का रक्त, सिर और मछली सामने चढ़ाई जाएं।
सिंह-मस्तक और दरियाई घोड़े का शीश और रक्त देवी के पीछे न चढ़ाया जाए, बल्कि दाएं, बाएं और सम्मुख चढ़ायें।
समर्पण दीप या तो दाएं हाथ में रखें अथवा सम्मुख किसी भी दशा में, बाएं हाथ में नहीं। सुगंधि बाईं ओर की जाएं या समक्ष किन्तु दाईं ओर नहीं। सुगंध, पुष्प और आभूषण सम्मुख रखे जाएं। जो विधि बताई है, उसका पालन किया जाए। अन्य पेयों के पश्चात् बाईं और मदिरा चढ़ाई जाए।
‘‘यदि प्रेत-आत्माओं की पूजा नितांत अनिवार्य हो तो पहले वर्ग के तीन व्यक्तियों को पीतल-पात्र में नारियल का पानी, अथवा ताम्रपात्र में शहद दिया जाए। दैवी विपदा के समय भी, पहले तीन वर्गों के व्यक्ति मादक मदिरा भेंट चढ़ाएं जो पुष्पों से बनी नहीं होनी चाहिए अथवा दमपुख्त भोजन न परोसा जाए। राजकुमार, मंत्रीगण, अमात्य और कलाल धन-सम्पदा के लिए मानव-बलि चढ़ाएं।
‘‘यदि राजकुमार की सहमति के बिना मानव-बलि चढ़ाई जाती है तो बलिदाता पाप करता है। युद्ध के अवश्यंभावी भय की दशा में बलि केवल राजकुमार या मंत्रियों द्वारा चढ़ाई जाए। किसी और के द्वारा नहीं।
‘‘मनुष्य को बलि से एक दिन पूर्व मंत्र सुना कर और दैवी गंध से तैयार किया जाए और उसके शीश को कुल्हाड़ी से छुआएं। कुल्हाड़ी पर चंदन का लेप करें। फिर कुछ चंदन कुल्हाड़ी से छुड़ाएं और बलि-पात्र की गर्दन पर मलें।
‘‘फिर अम्बे अम्बिका आदि का मंत्र पढ़ें। रौद्र और भैरव मंत्र पढ़ा जाए। इस प्रकार शुद्ध किए गए मनुष्य की देवी स्वयं रक्षा करेंगी, उसे कोई व्याधि नहीं होगी। शोकादि से उसका मानस भी विचलित नहीं होगा। उसके किसी परिजन की मृत्यु से भी उसकी शुचिता भंग नहीं होगी।
‘‘बलि पात्र को रस्सी बांधकर और मंत्रों से रक्षित कर उसके सिर पर वार किया जाए और उसे सावधानीपूर्वक देवी को चढ़ाया जाए। यह बलियां शत्रुओं की संख्या