पन्द्रहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने अहिंसक देवता के साथ रक्त-पिपासु देवी का विवाह क्यों किया? - Page 135

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के अनुपात में हों, फिर शत्रु-विनाश के लिए मंत्र के साथ शत्रु की आत्मा उसमें डालकर कुल्हाड़ी से बलि-पात्र का सिर काटा जाए। बलि चढ़ जाने के बाद वह शत्रु का विनाश करेगी।

‘‘पूजा के घोषित उद्देश्य के लिए ऐसे व्यक्ति का रक्त लिया जाए, जिसका शरीर और मन स्वच्छ तथा शुद्ध हो, भय-मुक्त हो। उसे कमल-दल में भर कर मंत्रोचार के साथ चढ़ाया जाए।

‘‘रक्त यदि छुरे या कुल्हाड़ी से चीरा देकर निकाला जाता है तो यह शस्त्र के अनुपात के अनुसार सुखद होता है।

‘‘बलि चढ़ाने वाला कमल-दल में उपस्थित रक्त की एक चौथाई मात्रा चढ़ाए परंतु किसी भी दशा में इससे अधिक नहीं होना चाहिए, शरीर का भाग आवश्यकता से अधिक नहीं काटा जाना चाहिए। जो अपना रक्त अथवा मांस स्वेच्छा से अर्पित करे। मांस के लिए वह अलसी, मांस, तिल अथवा मदिरा प्राप्त करे।’’

जो इन नियमों के अनुसार बलि देता है, उसका मनोरथ पूरा होता है।

काली पुराण, धर्म का यह उपदेश देता हैः

मनु द्वारा सदियों तक निर्दिष्ट अहिंसा तंत्रों द्वारा ध्वस्त कर दी गई, जिसका यह विकृततम रूप है। इसमें पशु और मानव हिंसा का प्रभुत्व है। हिंसा का यह उपदेश, जो काली पुराण के रुधिर आध्याय में दिया गया है, काफी प्रचलित हो गया था। पशु-बलि के पुनर्राम्भ के प्रमाण कलकत्ता के काली मंदिर में मिलते हैं। यह मंदिर पूरी तरह वधशाला बन गया है जहां हजारों बकरे, देवी काली को प्रसन्न करने के लिए चढ़ाए जाते हैं। यह काली पुराण के उपदेशों का परिचायक है। आजकल देवी काली को मनुष्य-बलि नहीं चढ़ाई जाती। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि ऐसा कभी नहीं हुआ। इसके विपरीत ऐसे अनेक साक्ष्य हैं कि काली पुराण के उपदेशों के अनुसार पशु-बलि की तरह ही मानव-बलि दी जाती थी। डॉ. राजेन्द्रलाल मित्र ने लिखा हैः ख्1,

‘‘यह सर्वविदित है कि बहुत समय तक यह पूजा (मनुष्य-बलि) पूरे हिन्दुस्तान में आम बात थी। ऐसे लोगों का अभाव नहीं है, जिन्हें संदेह है कि भारत में कुछ ऐसे स्थल हैं, जहां देवी को प्रसन्न करने के लिए कभी-कभार आज भी मनुष्य की बलि दे दी जाती है। वामाचारियों से संबद्ध पुराने परिवारों में, जिनके पूर्वजों ने दुर्गा

  1. इंडो-आर्यन्स, भाग 2, पृ. 109-111