पन्द्रहवीं पहेली
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और काली-पूजा में विधिपूर्वक मानव-बलियां दी थीं, आजकल भी जीवित मनुष्यों के स्थान पर उनके पुतलों की बलि चढ़ाई जाती है। एक फुट ऊंचा पुतला खोए से बनाया जाता है और काली पुराण की विधि के अनुसार उसका बलिदान किया जाता है। अंतर केवल इतना है कि उस पुतले में प्राण-प्रतिष्ठा के लिए कुछ मंत्र और जोड़ दिए गए हैं। चौबीस परगना के मेरे डिप्टी कलेक्टर मित्र बाबू हेमचन्द्र केर ने बंगाल में पटसन संस्कृत पर एक उत्तम पुस्तक लिखी है उन्होंने मुझे बताया कि बंगाल के पूर्वी क्षेत्रों में इस प्रकार की बलि प्रायः दी जाती है। परन्तु पुतला एक व्यक्ति द्वारा न काटा जाकर परिवार के सभी वयस्क लोगों द्वारा एक साथ काटा जाता है। वे या तो अलग-अलग चाकुओं से एक साथ वार करते हैं अथवा एक ही चाकू को संयुक्त रूप से पकड़ते हैं। इसे शत्रुबल कहा जाता है। नरबलि और शत्रुबलि गुप्त रूप से मध्यरात्रि में दी जाती है। बहरहाल, शत्रुबलि कालिका पुराण की नरबलि से एक भिन्न पूजा है, इसका निर्देश वृहन्नला तंत्र में हैं, जिसमें कहा गया है कि उल्लिखित अन्य पूजाएं सम्पूर्ण हो जाने के बाद राजा को खोए से बने अपने शत्रु (पुतला स्वरूप) की बलि देनी चाहिए। उसे अग्नि के समान दहकती आंखों से देखें। भरपूर वार करें और एक ही बारी में उसके दो टुकड़े कर दें। इससे पूर्व उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर ली जाए और जिस व्यक्ति का विनाश किया जाना है, उसका नाम लिया जाए। ओ महेश भार्या! उसके शत्रु का नाश कर।’’
इस संबंध में यह जानना महत्वपूर्ण है कि काली शिव की पत्नी हैं। प्रश्न यह है कि क्या शिव पशुबलि स्वीकार करते हैं? उत्तर यह है कि एक समय शिव पशु-बलि पर निर्भर थे। आज के शिवभक्तों को यह बात अनोखी लग सकती है। परन्तु यह यथार्थ है और जो कोई इसका प्रमाण चाहे, वह आश्वलायन गृह्यसूत्र देखें जिसमें शिव की संतुष्टि के लिए वृषभ की बलि का विस्तृत विवरण है। मैं इस आश्वलनायन गृह्य-सूत्र ख्1, का यथावत पाठ प्रस्तुत करता हूं। उसका कथन हैः
अब छिद्रित वृषभ (रुद्र के लिए) बलि चढ़ाया जाता है।
आर्द्रा-नक्षत्र में अथवा वसंत में।
अपने झुण्ड में समाविष्ट।
(वृषभ) न कोढ़ी और न ही चितला।
कुछ के मत में काली चित्ती वाला।
सैक्रेड बुक्स ऑफ दी ईस्ट (एस.बी.ई.) भाग 29, पृ. 255-259 (मैक्समूलर)।