122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यदि वह चाहे, काला, यदि इच्छा हो तो ताम्रवर्णी।
वह उस पर पानी छिड़कता है, जिसमें उसने चावल और जौ डाले होते
हैं।
सिर से पूंछ तक (सर्वांग)।
मंत्र (सहित) महान देव रुद्र के लिए तैयार हो जा।
वह उसे बड़ा होने दे, जब उसके दांत आ जाएं अथवा वृषभ बन जाए।
उस क्षेत्र में जो विशिष्ट रूप से शुद्ध हो।
ऐसे स्थान पर जो गांव से दिखाई न दे।
मध्यरात्रि के पश्चात्।
कुछ के मत में सूर्योदय के पश्चात्।
फिर पूजा के ज्ञाता ब्राह्मण को बिठाएं। इससे पहले पेड़ के पत्तीदार तने से
बलिखम्ब बनाएं, उसमें दो लताओं अथवा कुश की दो रस्सियां मेखला की
तरह बांधें। एक सिरा बलि-पशु के सिर के मध्य में बांधें। फिर वही मंत्र
बोलें कि जिसकी बलि के लिए लाया गया है, उसकी सहमत् से मैं तुम्हें
बांधता हूं।
पानी का छींटा उसी प्रकार दिया जाएगा जैसे पशु-बलि में दिया जाता है।
हमें भिन्नता बचानी होगी।
फिर श्रुतानुसार पत्री के साथ बलि दी जाए।
(मंत्र) के साथ ‘‘तव हर, मृदा, सर्व शिवा, भव, महादेव, उग्र, भीम,
पशुपति, रुद्र, शंकर, ईशाना स्वाहा’’।
अथवा अंतिम छ (सूत्र के)।
अथवा मंत्र ‘‘तव रुद्र स्वाहा’’।
फिर चारों दिशाओं में बलि अर्पित करें। मंत्र का भाव है ‘‘रुद्र, यह भेंट
तुझे प्रस्तुत है। तू मुझे हानि न पहुंचा।’’ इस प्रकार चारों दिशाओं में भेंट
चढ़ाई जाए।
- निम्नांकित मंत्रों से चारों दिशाओं की पूजा की जाए ‘‘रुद्र हम क्या करें’’।
‘‘यह प्रार्थना रुद्र के लिए हैं’’ ‘‘हे पिता तेरे लिए’’ ‘‘अति नमन के साथ
ये गीत रुद्र के लिए है’’। (ऋग्वेद 1. 43, 114, 11, 33 सप्तम 46)