परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 141

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तीन वेद ऋव्Q, साम और यजु का आविर्भाव हुआ।

सामवेद और यजुर्वेद में वेदों की उत्पत्ति का प्रसंग नहीं है।

इसके पश्चात् के ब्राह्मण ग्रंथों में शतपथ ब्राह्मण, तैत्तरीय ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण और कौषीतकि ब्राह्मण में ऐसे प्रयास दृष्टिगोचर हैं जिनमें वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या की गई है।

शतपथ ब्राह्मण में कई व्याख्याएं है। यह वेदों की उत्पत्ति का श्रेय प्रजापति को देता है। उसके अनुसार प्रजापति ने अपने तप से जगत, धरती, वायु और आकाश बनाए। उन्होंने इन तीनों में ऊष्मा संचारित की। इस ऊष्मा से तीन तेज उत्पन्न हुए। अग्नि, वायु और सूर्य। उसके ताप से तीन वेद उत्पन्न हुए। अग्नि से ऋग्वेद, वायु से ययुर्वेद और सूर्य से सामवेद।

ऐतरेय और कौषीतकि ब्राह्मण की भी यही व्याख्या है। शतपथ ब्राह्मण ख्1, ने प्रजापति से वेदों की उत्पत्ति बताई है। भाष्य के अनुसार प्रजापति ने जल से तीन वेद बनाए। शतपथ ब्राह्मण कहता है-

‘‘पुरुष प्रजापति की इच्छा हुई, ‘‘मेरी अभिवृद्धि हो, मेरा विस्तार हो’’। वे उपासना में बैठ गए, उन्होंने घोर तप किया। इस तप से उन्होंने सर्वप्रथम पवित्र ज्ञान, त्रिवैदिक विज्ञान की रचना की। यह उनका आधार बना। उन्होंने कहा ‘‘प्रज्ञा ब्रह्माण्ड’’ का मूल है।’’ वेदों के ज्ञान के पश्चात् पुरुष को आधार मिला क्योंकि प्रज्ञा उनका मूल है। इस आधार पर प्रजापति ने घोर तप किया। उन्होंने वाव्Q (वाणी) से जल का निर्माण किया। उसके विस्तारण से जल अप्प कहलाया। उसकी सर्वत्र व्यापकता से वह ‘‘वारि’’ बना। उन्होंने चाहा, मेरा जल से विस्तार हो। इस त्रिवेद विज्ञान से वे जल में प्रविष्ट हुए। तब एक अण्डज उभरा। उन्होंने उसे प्राणवान किया और कहा- ‘‘भव भव पुनर्भव। जब प्रज्ञा का जन्म हुआ। त्रिवेद विज्ञान। फिर पुरुष ने कहा प्रज्ञा ब्रह्मांड की प्रथम सृष्टि है। पुरुष के समक्ष सर्वप्रथम प्रज्ञा की रचना हुई, इसलिए यह उसका मुख बनी। उसे वेद ज्ञाता की संज्ञा दी गई। इस प्रकार आगे वे कहते हैं। वह अग्नि के समान है क्योंकि प्रज्ञा अग्नि का मुख है।’’

‘‘क्योंकि अग्नि आर्द्र काष्ठ से उत्पन्न हुई थी। उससे भांति-भांत के धूम्र उभरे। वह परमात्मा का श्वास है, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्व, आंगिरसों, इतिहास, पुराण, विज्ञान, उपनिषद्, श्लोक, सूक्त, विभिन्न राजाओं के भाष्य - ये सब उसका श्वास हैं।’’

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 8