परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 142

परिविष्ट-1

शतपथ ब्राह्मण में तीसरी व्याख्या हैः ख्1,

127

‘‘मैंने तुझे सागर में स्थापित किया, वहीं तेरा आसन है। मस्तिष्क सागर है। मानस सागर से वाच द्वारा भगवान ने बेलचे से त्रिवैदिक विज्ञान को खोदकर निकाला। तत्पश्चात् इस मंत्र का उच्चारण किया। प्रज्ञावान देवता जाने, इस आहुति सामग्री को उन्होंने कहां रखा? जिसे ईश्वर ने तेजधार बेलचे से खोदकर निकाला था। मस्तिष्क समुद्र है। वाच तीव्र बेलचा है। त्रिवैदिक विज्ञान समिधा है। इस संदर्भ में मंत्र को उच्चारा। वह मस्तिष्क में समा गया।’’

तैत्तरीय ब्राह्मण की तीन व्याख्याएं है। वह कहता है, वेदों के कर्त्ता प्रजापति हैं। वह कहता है प्रजापति ने राजा सोम को बनाया और तत्पश्चात् तीन वेदों की रचना की गई ख्2, । इस ब्राह्मण की दूसरी व्याख्या ख्3, का प्रजापति से कोई तात्पर्य नहीं। इसके अनुसारः

‘‘वाच अविनाशी है। वह पूजा में प्रथम प्रसूत है। वेदों की जननी और अमरता का केन्द्र बिन्दु। हममें आनंद स्रजित कर वह यज्ञ बन जाती है। रक्षा की देवी सरस्वती में मेरे आह्वान को सुनने को उद्यत हो। मेधावान ऋषि, मंत्रों के सृष्टा, देवगण जिनका अनुग्रह तप और कठोर उपासना से प्राप्त करते हैं।’’

इस सबके ऊपर तैत्तरीय ब्राह्मण तीसरी व्याख्या देता है। वह कहता है कि वेद प्रजापति की दाढ़ी से उत्पन्न हुए।

उपनिषदों में भी वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या की गई है।

छांदोग्य उपनिषद की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण के समान है। अर्थात् ऋग्वेद अग्नि से उत्पनन हुआ, यजुर्वेद वायु से और सामवेद सूर्य से उत्पन्न हुआ।

बृहदारण्यक उपनिषद ने जो शतपथ ब्राह्मण का अंग है, अलग कथा कही हैः

‘‘प्रजापति द्वारा जिनका मृत्यु या यम के साथ तादात्म्य है वाच की रचना कही गई है और उसके माध्यम से आत्मा के साथ वेदों सहित सभी तत्वों का सृजन हुआ। उसी वाच और आत्मा से उसने सबका सृजन किया चाहे वह ऋग्वेद हो, यजुस, साम, छंद, यज्ञ या विभिन्न जीव-जंतु हों।’’

‘‘तीन वेद तीन तत्व हैं, वाच, मानस और श्वास। वाच ऋग्वेद है, मानस यजुर्वेद है और श्वास सामवेद।’’

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, भाग 1, पृ. 9-10

  2. म्यूर, खंड 1, पृ. 8

  3. वही पृ. 10