परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 143

128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अब हम स्मृतियों पर आते हैं। मनुस्मृति में वेदों की उत्पत्ति के विषय में दो सिद्धांत हैं। एक स्थल पर कहा गया है कि वेदों का कर्त्ता ब्रह्मा है।

‘‘हिरण्यगर्भ उसी ब्रह्मा ने सभी के नाम कर्म तथा लौकिक व्यवस्था को पहले वेद शब्दों से जानकर पृथव्Q-पृथव्Q बनाया उस ब्रह्मा ने इन्द्रादिदेव, कर्म, स्वभाव, प्राणी-अप्राणी, पत्थर आदि साध्यगण और सनातन यज्ञ की सृष्टि की। उस ब्रह्मा ने यज्ञों की सिद्धि के लिए अग्नि, वायु और सूर्य से नित्य ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद को क्रमशः प्रकट किया।

एक अन्य स्थान पर यह माना गया लगता है कि प्रजापति वेदों के सृष्टा हैं जो निम्नलिखित से प्रकट हैंः

‘‘प्रजापति ने तीन वेदों से तीन अक्षर लिए अ, उ, म साथ ही भू, भुवह, और स्व लिया। उसी परम पुरुष प्रजापति ने तीन वेदों से कुछ अंश लिए सावित्री (अथवा गायत्री) आरम्भ में शब्द तत् लिया .... तीन अविनाशी अंशों (भू भुवहस्व) से बना ओउम और गायत्री के तीन चरण ब्रह्मा का मुख माने जाते हैं।’’

यह जानना भी रोचक है कि पुराणों ने वेदों के विषय में क्या कहा है? विष्णु पुराण कहता हैः

‘‘ब्रह्मा ने अपने पूर्वी मुख से गायत्री को बनाया, ऋग् मंत्रों, त्रिवृत समरथांतर तथा यज्ञ और अग्निस्तोम को रचा। अपने दक्षिणी मुख से उन्होंने यजुस मंत्रों को उत्पन्न किया। त्रिष्टुप छंद, पंचदश स्रोम, बृहत् साम और उकथ्य की रचना की। पश्चिमी मुख से साम छंदों और जगति मंत्रों को रचा, सप्तदश स्रोम, वैरूप और अतिरात्र की रचना की। अपने उत्तरी मुख से उन्होंने एकाविंश और अथर्वन् अपतोर्यमन की अनुष्टुप और विराज छंदों में रचना की।’’

भागवत पुराण का मत हैः

‘‘एक बार चतुर्मुख सृष्टा के मुख से वेदों का प्रस्फुटन हुआ जबकि वे समाधि में लीन थे। मैं सम्पूर्ण विश्व की पूर्ववत रचना कैसे करूं?.......... उन्होंने अपने पूर्वी तथा अन्य मुखों से स्तुति, यज्ञ, मंत्रों और प्रायश्चित सहित ऋव्Q, यजुस, साम, अथर्वन की सृष्टि की।’’

मार्कण्डेय पुराण का मत है-

‘‘1. ब्रह्मा के पूर्व मुख का अगोचर प्रस्फुटन हुआ, उससे एक विभाजन अंडज से समृद्ध ऋचाएं उपजीं, 2. जो पाटल के पुष्प समान, मेधावी परस्पर विभाजनीय होते हुए भी गुथी हुई और रजस गुणों के सदृश्य। 3. उनके दक्षिण मुख से उन्मुक्त यजुस