परिविष्ट-1 129
ऋचाएं फूटीं। कुंदन वर्ण और विभक्त, 4. परम ब्रह्मा के पश्चिमी मुख से साम मंत्र और छंद निस्रत हुए, 5 और 6. वेदों (ब्रह्मा) के उत्तरी मुख से श्यामल मधुमक्खियां और काजल जैसे वर्ण का अथर्वन प्रकट हुआ, जिसकी प्रवृति एक बार भयावह और अभयावह, सम्मोहन को निष्प्रभावी करने में सक्षम निर्विकार और अंधकार दोनों गुणों से युक्त और सुरम्य तथा वपरीत, 7. ऋव्Q के मंत्र राजसी गुण सम्पन्न यजुस के सात्विक, साम के तामसी और अथर्वन के तामसिक तथा सात्विक दोनों गुण हैं।’’
हरिवंश, ब्रह्मा और प्रजापत दोनों सिद्धांतों का पक्षधर हैः
‘‘विश्व के विस्तार हेतु ब्रह्मा समाधिस्थ हो गए, चन्द्रमा से ज्योति पुंज निस्रत कया, गायत्री के हृदय में प्रवेश किया, उसके नेत्रों के मध्य में प्रविष्ट होते हुए। उससे तब एक नर रूप चतुष्पद की सृष्टि की, जो ब्रह्मा की तरह द्युतिमान्, अकथनीय, अजर-अमर, अविकारी और निर्गुण, विलक्षण प्रतिभा संपन्न, चंद्र किरनों की तरह निर्मल, प्रदीप और अक्षर युक्त था। परमेश्वर ने ऋग्वेद की रचना की, साथ ही अपने नेत्रों से यजुस, अपनी जिह्वा से सामवेद, और अपने मत्सक से अथर्वन रचा। इन वेदों ने अपनी सृष्टि के साथ ही अपना आकार (क्षेत्र) ग्रहण कर लिया। उसमें वेदों की प्रवृत्तियां उत्पन्न हो गईं, क्योंकि उन्हें विंदांती प्राप्त हुई। तब इन वेदों ने पूर्व-स्थित अनादि-अनंत ब्रह्म (पावन-विज्ञान) का सृजन किया, स्वमेधा जनित गुणों से दिव्य ब्रह्माण्ड रूप धारण किया।’’
यह प्रजापति को सृष्टा स्वीकार करता है। यह कहता है कि जब परमपुरुष ने अपने मुख से ब्रह्मांड और हिरण्यगर्भ की रचना की और अपने को विखण्डित करने की इच्छा की उन्हें संदेह था कि यह कैसे होगा।
हरिवंश आगे कहता हैः
‘‘जब वह इस प्रकार प्रतिबिम्बित हो रहे थे, तो उनके मुख से ओýम शब्द निकला। जो पृथ्वी, वायु और आकाश में प्रतिध्वनित हुआ। जब देवाधिदेव ने इसका बार-बार उच्चारण किया तो उनके चित् से मस्तिष्क का सत्व सक्रिय हुआ। उनके हृदय से वषट्कार उद्धेलित हुआ। तब पवित्र और परमोत्कर्ष व्याहृतियां भू, भव, स्व से महान स्मृति बनी, जो पृथ्वी, वायु और आकाश से ध्वनि रूप में परिवर्तित हुई। तब देवी उत्पन्न हुई, श्रेष्ठतम छंद बने। चौबीस पदीय (गायत्री) की रचना हुई। दैवी शब्द तत् से परमेश्वर ने सावित्री रची। तब उसने ऋव्Q, साम, यजुर्वेद और अथर्वन आदि वेदों, उनकी प्रार्थनाओं और संस्कारों की रचना की।’’
वेदों की सृष्टि के संबंध में ग्यारह विभिन्न व्याख्याएं हैंः 1. पुरुष के रहस्यात्मक