130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यज्ञ से, 2. स्कंभ से, 3. उनके प्रत्यंगों से जैसे उनके केश और मुख, 4. इन्द्र से, 5. काल से, 6. अग्नि, वायु और सूर्य से, 7. प्रजापति के विस्तारण और जल से, 8. ब्रह्मा की श्वास से, 9. परमेश्वर द्वारा मानस सागर की खुदाई से, 10 प्रजापति की दाढ़ी से, 11. वाच के प्रस्फुरण से।
एक साधारण से प्रश्न का इस तरह को बढ़ाचढ़ाकर भ्रामक उत्तर एक पहेली है। इन सब प्रश्नों का उत्तर देने वाले ब्राह्मण हैं। वे सभी वैदिक परम्परा के दास हैं। वही प्राचीन धार्मिक कथाओं के संरक्षक हैं। वे इस सीधे सवाल का फिर ऐसा बेसिर पैर का अस्पष्ट उत्तर क्यों देते हैं?
II
वेदों का रचयिता कौन है? हिंदुओं का विश्वास है कि वेद दैवी रचना है। तकनीकी शब्दावली में वेद अपौरुषेय हैं, अर्थात् मानवेंतर हैं।
इस विश्वास का साक्ष्य क्या है? प्राचीन संस्कृत साहित्य में एक रचना है अनुक्रमणी। वैदिक साहित्य के विभिन्न अंगों का इसमें व्यवस्थित संकेत हैं। प्रत्येक वेद की एक अनुक्रमणी है। कहीं-कहीं एक से अधिक भी हैं। ऋग्वेद की सात अनुक्रमणी उपलब्ध हैं। इनमें से पांच शौनक की, एक कात्यायन की और एक किसी अज्ञात लेखक की तैयार की हुई है। यजुर्वेद की तीन हैं। इसकी तीन शाखाओं में से प्रत्येक की एक है। ये हैं, आत्रेयी, चारण्या और मध्यांदिन। सामवेद की दो अनुक्रमणी हैं। एक का नाम आर्शेय ब्राह्मण है और एक का नाम परिशिष्ट है। अथर्ववेद की एक अनुक्रमणी है। इसका नाम बृहत सर्वानुक्रमणी है।
प्रो. मैक्समूलर के अनुसार सबसे पूर्ण अनुक्रमणी कात्यायन की ऋग्वेद के लिए सर्वानुक्रमणी है।
इसकी महत्ता इस कारण है कि 1. इसमें प्रत्येक मंत्र का प्रथम शब्द दिया है, 2. मंत्रों की संख्या है, 3. संकलनकर्ता ऋषि, उसकी परम्परा का नाम, 4. देवता का नाम और 5. प्रत्येक छंद का नाम दिया है। सर्वानुक्रमणी के संदर्भ से यह आभास मिलता है कि विभिन्न ऋषियों ने मंत्रों की रचना की और उनका सम्पूर्ण संकलन ऋग्वेद बना। ऋग्वेद की अनुक्रमणी के अनुसार यह साक्ष्य मिलता है कि यह वेद पौरुषेय है। अन्य वेदों के विषय में भी यही निष्कर्ष हो सकता है।
अनुक्रमणी यथार्थ है। यह ऋग्वेद के मंत्रों से पता चलता है जिसमें ऋषि अपने को वेदों का संयोजक मानते हैं। कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैंः
‘‘कण्वों ने तुम्हारे लिए प्रार्थना की, उनकी स्तुति सुनो’’