परिविष्ट-1 131
‘‘हे इन्द्र! अश्वों के सारथी अपने प्रभावोत्पादकता हेतु गौतम का मंत्र सुनो’’
‘‘तेरे तेजवर्धनार्थ हे ऐश्वर्यवान अश्विन! मानस द्वारा प्रभावोत्पादक मंत्रों की रचना की गई है।’’
‘‘हे अश्विन! यह सार्थक उपासना मंत्र तेरे लिए गृत्समद ने उच्चारा है।’’
‘‘हे इन्द्र! तू प्राचीन है, जो अश्वों को जोतता है, तेरे लिए गौतम के वंशज नोधाओं ने नया मंत्र रचा है।’’
‘‘सो हे पुरोधा! प्रश्रय हेतु गृत्समद ने मंत्र रचा है, जैसे मनुष्य निर्माण करता है।’’
‘‘ऋषियों ने इन्द्र के लिए एक प्रभावोत्पादक रचना की है और प्रार्थना की है।’’
हे अग्नि! यह मंत्र तेरे लिए रचा है अपनी गउओं और अश्वों का सुख भोग।’’
‘‘हमारे पता इन्द्र के मित्र अयाश्य ने सप्त शीर्ष पवित्र सत्यज इस चौथे महान मंत्र का आह्वान किया है।’’
‘‘हम रहुगणों ने मधुभाषी अग्नि के लिए मंत्रोच्चार किया है। उसका गुणगान करते हैं।’’
‘‘सो आदित्यो, अदितयों और सत्ता-सम्पन्न गण प्लाति पुत्र ने तुम्हारी स्तुति की है। गया ने स्वर्गीय देवों की प्रशस्ति गाई है।’’
‘‘इसी को वे ऋषि पुरोहित यज्ञकर्ता कहते हैं, स्तुति गायक, मंत्रोच्चारक कहते हैं। वही (अग्नि के) तीन शरीरों को जानता है। वही वरदानों की पूर्ति करने वाला प्रमुख है।’’
अनुक्रमणिकाओं के अतिरिक्त और भी साक्ष्य हैं, जिनसे पता चलता है कि वेद अपौरुषेय नहीं हैं। ऋषि वेदों को मानवकृत और ऐतिहासिक रचना मानते हैं। ऋग्वेद के मंत्र पूर्ववर्ती और तत्कालीन मंत्रों के बीच भेद करते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैंः
‘‘अग्नि जिसकी पूर्ववर्ती और साथ ही वर्तमान ऋषि भी स्तुति करते हैं, देवों को इधर आमंत्रित करेगी।’’
‘‘पूर्ववर्ती ऋषि ने संकटमोचन हेतु तेरा आह्वान किया।’’
‘‘मुझ वर्तमान ऋषि की ऋचाएं सुनो, इस वर्तमान (ऋषि) की।’’
‘‘इन्द्र! तू पूर्ववर्ती ऋषियों के लिए एक आह्लाद था, जिन्होंने तेरी अर्चना की।
जैसे पिपासु के लिए जल। इस मंत्र द्वारा मैं तेरा पुनः पुनः आह्वान करता हूं।’’
‘‘पूर्ववर्ती ऋषयों, देदीप्यमान मुनियों ने बृहस्पति के सम्मुख आह्लादपूर्ण स्वर में प्रस्तुत किया।’’